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  तेजेन्द्र शर्मा की कविता - पतझड़

Sunday, October 18, 2009

तेजेन्द्र शर्मा जी का जन्म 21 अक्टूबर 1952 को पंजाब के शहर जगरांव में हुआ। तेजेन्द्र शर्मा की स्कूली पढाई दिल्ली के अंधा मुगल क्षेत्र के सरकारी स्कूल में हुई. आपनें दिल्ली विश्विद्यालय से बी.ए. (ऑनर्स) अंग्रेज़ी, एम.ए. अंग्रेज़ी, एवं कम्पयूटर कार्य में डिप्लोमा किया है।

आपकी प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ हैं - कहानी संग्रह : काला सागर (1990), ढिबरी टाईट (1994 - पुरस्कृत), देह की कीमत (1999), ये क्या हो गया ? (2003) पंजाबी में अनूदित कहानी संग्रह - ढिम्बरी टाईट। नेपाली मे अनूदित कहानी संग्रह - पासपोर्ट का रंगहरू, उर्दू मे अनूदित कहानी संग्रह - ईटो का जंगल।

आपकी भारत एवं इंगलैंड की लगभग सभी पत्र पत्रिकाओं में कहानियां, लेख, समीक्षाएं, कविताएं एवं गज़लें प्रकाशित हुई हैं साथ ही आपकी कहानियों का पंजाबी, मराठी, गुजराती, उडिया और अंग्रेज़ी में अनुवाद प्रकाशित हुआ है।

आपने दूरदर्शन के लिये शांति सीरियल का लेखन भी किया है। आपने अन्नु कपूर द्वारा निर्देशित फिल्म अभय में नाना पाटेकर के साथ अभिनय भी किया है। आपकी अन्य गतिविधियों में बीबीसी लंदन, ऑल इंडिया रेडियो, व दूरदर्शन से कार्यक्रमों की प्रस्तुति, अनेकों नाटकों में प्रतिभागिता एवं समाचार वाचन प्रमुख हैं।

आपको अनेकों पुरस्कार व सम्मान प्राप्त हैं जिनमें ढिबरी टाइट के लिये महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी पुरस्कार - 1995 प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के हाथों, सहयोग फौन्देशन का युवा साहित्यकार पुरस्कार – 1998, सुपथगा सम्मान – 1987, कृति यूके द्वारा वर्ष 2002 के लिये बेघर आंखें को सर्वश्रेष्ठ कहानी का पुरस्कार आदि प्रमुख हैं।


तेजेन्द्र शर्मा की कविता -

पतझड़

पत्तों ने ली अंगड़ाई है
क्या पतझड़ आया है?
इक रंगोली बिखराई है
क्या पतझड़ आया है?

रंगों की जैसे नई छटा
है छाई सभी दरख़्तों पर
पश्चिम में जैसे आज पिया
चलती पुरवाई है
क्या पतझड़ आया है?

पत्तों ने कैसे फूलों को
दे डाली एक चुनौती है
सुंदरता के इस आलम में
इक मस्ती छाई है
क्या पतझड़ आया है?

कुदरत ने देखो पत्तों को
है एक नया परिधान दिया
दुल्हन जैसे करके श्रृंगार
सकुची शरमाई है
क्या पतझड़ आया है?

पत्तों ने बेलों ने देखो
इक इंद्रधनुष है रच डाला
वर्षा के इंद्रधनुष को जैसे
लज्जा आई है
क्या पतझड़ आया है?

नारंगी, बैंगनी, लाल सुर्ख़
कत्थई, श्वेत भी दिखते हैं
था बासी पड़ ग़या रंग हरा
मुक्ति दिलवाई है
क्या पतझड़ आया है?

कोई वर्षा का गुणगान करे
कोई गीत वसंत के गाता है
मेरे बदरंग से जीवन में
छाई तरूणाई है
क्या पतझड़ आया है?

प्रस्तुति-
-सुशील कुमार।

1 comments:

"अर्श" October 18, 2009 at 5:16 PM  

दिवाली की समस्त शुभकामनाएं पुरे परिवार को ...


अर्श

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