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  पप्‍पू की मम्‍मी की चिंता खत्‍म हो गई है, मत समझें पप्‍पू की शादी हो गई है

Saturday, October 3, 2009


पप्‍पू बोला मम्‍मी से
पर शादी से पहले की बात है
उसकी मम्‍मी की शादी से पहले की नहीं
पप्‍पू की शादी से पहले की।

मम्‍मी आपकी चिंता का हल
पापा ने निकाल लिया है ?

कौन सी चिंता हल कर दी है
जानना चाह रही है मम्‍मी ?

आज तक तो वो सदा
हलचल ही मचाते रहे हैं
मन और मानस में मेरे।

आपको याद है वो प्‍लेट
जिसके टूटने की चिंता
सताती थी आपको हरदम।

क्‍या हल निकाला
खुश हो गई मम्‍मी
पप्‍पू की मम्‍मी जो है।

किया कुछ नहीं बस
ठीक से पकड़ नहीं पाए
पापा और प्‍लेट जा जा
हो गई सो चिंता छूट गई।

10 comments:

नन्हीं लेखिका - Rashmi Swaroop October 3, 2009 at 11:04 AM  

आइये, हम भी पप्पू की तरह अपनी मम्मियों को खुश करें और घर के सभी delicate item तोड़ के माताओं को चिन्तामुक्त करें…
धन्यवाद पप्पू !
:)

lalit sharma October 3, 2009 at 11:05 AM  

राम-राम अविनाश जी
पप्पु की मम्मी की तो चिंता खतम हो गई पण मेरी बढ गई,शायद आपके हजार हाथ सै जो इतणी जल्दी-जल्दी आप की पोस्ट आ जा सै या तो फ़ेर कोई अलाद्दीन आला जिन्न हाथ लग रह्या सै,म्हारी तो दिन मै तीन पोस्टां का ही चक्कर पड़ जा सै थोड़ा खुलासा(अकल्ले मे) करते तो म्हारी भी हैरानी दुर होती,
आपने दो बार राम-राम

राज भाटिय़ा October 3, 2009 at 12:59 PM  

ललित शर्मा जी, पप्पू, पप्पु की मम्मी ओर पप्पू के पापा सब लिखते है एक एक पोस्ट, फ़िर तोडते है घर की पलेटे. ओर पलेटो की झंकार से जो संगीत उतपन होता है उस से बनती है कविता, ओर कविता मै जो मिठास आती है वो आती है पप्पू की मम्मी की मिठ्ठी मिठ्ठी हंसी से... तो चलिये आप भी कुछ ऎसा करे
पप्पू जी को बहुत बहुत प्यार जी, इस सुंदर कविता के लिये

अविनाश वाचस्पति October 3, 2009 at 1:21 PM  

@ रश्मि स्‍वरूप
@ ललित शर्मा

राज जी की सलाह से रहिए सावधान
इनकी सैटिंग फिरोजाबाद के क्राकरी निर्माताओं सै
अक आप तोड़ते जाओ, थक जाओगे
पर वे बनाते बेचते कभी नहीं थकेंगे
अपने स्विस बैंक के खाते लबालब भरेंगे।

जी.के. अवधिया October 3, 2009 at 2:38 PM  

वाचस्पति रचना रचे, भाषा उनकी ठेठ।
चिंता निवारण के लिए, अब तोड़ो तुम प्लेट॥

अविनाश वाचस्पति October 3, 2009 at 7:06 PM  

@ ललित शर्मा

पप्पू की मम्मी की तो चिंता खतम हो गई पण मेरी बढ गई। इब तै लागै सै अक पप्‍पू फिर से फेल होएगा।

अजेय October 4, 2009 at 6:29 AM  

आप की यह कविता 'ज़ेन' उक्ति सी लगती है. साथ में नन्ही लेखिका की टिप्पणी भी..
इस ताज़गी भरे थॉट के लिए दोनों को बधाई.
............... लगे रहो मुन्ना भाई !

HARI SHARMA October 4, 2009 at 10:01 AM  

जिन हाथो़ से चीनी की प्लेट नही सम्भलती वो रसोई की जिम्मेदारी क्या उठायेन्गे.

कुलवंत हैप्पी October 4, 2009 at 8:45 PM  

pappu hit hai..har kirdar main pappu fit hai...

सुशील कुमार October 4, 2009 at 8:51 PM  

वाह सुन्दर!

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