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  भूपेन्द्र नारायण यादव ‘मधेपुरी’ की कवितायें -

Sunday, October 11, 2009

भूपेन्द्र नारायण यादव ‘मधेपुरी’, जन्मः 10 फरवरी 1947, आजादनगर, मधेपुरा, बिहार
शिक्षा: पी-एच.डी., भागलपुर विश्वविधालय। सक्रियता: विभिन्न विधाओं में निरन्तर लेखन और प्रकाशन। अनेक संस्थाओं से सक्रिय संबद्धता। आकाशवाणी से रचनाओं का प्रसारण। बी.एन.मंडल विश्वविधालय में कुलानुशासक, विकास पदाधिकारी, परीक्षा नियंत्रक आदि पद पर कार्य। प्रकाशित कृतियाँ: बूँद-बूँद सच एक सागर का, दृष्टिकोण, छोटा लक्ष्य एक अपराध है (राष्ट्रपति डा. कलाम द्वारा बच्चो के सवालों के जवाब पर आधारित) स्वप्न! स्वप्न!! स्वप्न!!! (राष्ट्रपति डा. कलाम की जीवनी) सम्प्रति: यूनिवर्सिटी प्रोफेसर एवं भौतिकी विभाग के अध्यक्ष। सचिव, कौशिकी क्षेत्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन, मधेपुरा। संपर्क: वृंदावन, आजादनगर, मधेपुरा- 852 113. बिहार. मोबाइल- 09431 254655.

भूपेन्द्र नारायण यादव ‘मधेपुरी’ की कवितायें-

तुम्हारा नाम


सुबह-सवेरे
धरती की गोद में
मखमल-सी मुलायम दूब के शीर्ष पर
मोतियों-सी चमकती ओस की बून्दों पर
लिख दिया है मैंने तुम्हारा नाम।


किशोर कल्पनाओं की पर्वतीय चोटियों पर
मोरपंखी झाडि.यों पर
समुद्री उफानों पर
सरगम के तरानों पर
चितेरे बादलों की कूचियों पर
विस्तृत नीले आकाश के कैनवास पर
लिख दिया है मैंने
तुम्हारा नाम।


कोसी के कछार में
मछली की टोह में जमीं
बगुलों की ध्यानमुद्रा पर
शैवाल जाल में छन कर आती
पतली जलधार पर
लिख दिया है मैंने
तुम्हारा नाम।


नदी किनारे झुके
बरगद की डालियों पर
कोमल कठोर टहनियों पर
चिडि.यों की बहुरंगी पांखों पर
उनके अनुराग भरे कलरव पर
लिख दिया है मैंने
तुम्हार नाम।


कोसी के एकान्त तट पर
धधकती चिता से निकलकर
धुएँ को चीरती हुई
ऊपर उठ रही नीली-पीली लपटें
जो राहे बनाती हैं-सजीले बादलों तक....
कांप रहे हाथों से, उन राहों पर भी
लिख दिया है मैंने
तुम्हारा नाम !
अपने नाम के साथ हीं।


आदमी


दिन में सूरज की रौशनी
रात में बिजली की चकाचैंध
आखिर अंधेरा!
जाये तो जाये किधर ?
सिमटकर
दुबक गया अंधेरा
आदमी के अन्दर
और
आहिस्ता-आहिस्ता
दीमक बनकर-
शख्सियत
वो
इंसानियत को
निगलता जा रहा है!
आदमी
अब आदमी नहीं........
बस!
लाश बनता जा रहा है!

प्रस्तुतकर्ता-

-सुशील कुमार।

5 comments:

श्यामल सुमन October 11, 2009 at 8:33 AM  

आंचलिकता की सुगंध लिए सुन्दर प्रतीकों के सहारे अपनी बातों को सहजता से कहने में मधेपुरी जी सफल रहे। प्रशंसनीय रचना। बधाई।

सुशील भाई - आपके प्रयासों की सराहना करना चाहता हूँ। आप सचमुच बहुत मेहनत करते हैं।

सादर
श्यामल सुमन
www.manoramsuman.blogspot.com

yehsilsila October 11, 2009 at 9:42 AM  

मखमल-सी मुलायम दूब के शीर्ष पर
मोतियों-सी चमकती ओस की बून्दों पर
लिख दिया है मैंने तुम्हारा नाम।

वाह भाई! आज सबेरे-सबेरे तबियत खुश कर दी आपने...बधई!

डा राजीव कुमार October 11, 2009 at 10:01 AM  

आखिर अंधेरा!
जाये तो जाये किधर ?...

कवि की चिंता में शामिल है हमारी चिता...अच्छी कविता के लिये बधाई!

PRAN SHARMA October 11, 2009 at 9:19 PM  

SAAREE KEE SAAREE KAVITAAYEN
ACHCHHEE LAGEE HAIN.SHABDON
AUR BHAVON KAA SANYOJAN BADAA
SUNDAR AUR SAHAJ HAI.MEREE BADHAAEE.

Suman October 18, 2009 at 1:33 PM  

विस्तृत नीले आकाश के कैनवास पर
लिख दिया है मैंने
तुम्हारा नाम।nice

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