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  संजीव निगम की कवितायें

Monday, September 28, 2009

संजीव निगम
परिचय : संजीव निगम [ एम् ए, एम फिल]
हिंदी के सुपरिचित लेखक, कवि, व्यंगकार और नाटककार .एक अत्यंत प्रभावी वक्ता भी. रचनाएँ देश की सभी प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित तथा आकाशवाणी और दूरदर्शन से प्रसारित.
.एक सरकारी बैंक में मुख्य प्रबंधक मार्केटिंग के पद पर काम करते हुए स्वेच्छा से सेवा निवृत्ति ले ली.
वर्तमान में एक व्यावसिक अकादमी में प्रबंधन विषयों के विभाग के प्रमुख .
विज्ञापन जगत से भी जुड़े तथा कई लघु फिल्मो,टीवी विज्ञापनों का लेखन .
आप मुंबई के कुछ कॉलेजों में पत्रकारिता पाठ्यक्रमो में अतिथि वक्ता हैं. लेखक तथा वक्ता के रूप में आपको अनेक सम्मान प्राप्त हैं..
संपर्क : 09821285194 , 022-28407204.

कवितायें

नहीं लिख सका माँ पर कविता

बहुत दिनों से सोच रहा था ,
मैं भी
माँ पर कोई कविता लिखूं .
जब सभी लोग लिख रहे हैं
तो मै ही क्यों पीछे रहूँ.
मैंने भी तो पाया था बचपन में
माँ का बहुत सा प्यार, दुलार.
कभी मीठी,कभी तीखी फटकार.
कभी किसी बहुत बड़ी गुस्ताखी का
प्यार भरा अनदेखापन,
और कभी ,छोटी सी शरारत पर भी
तेज़ झन्नाटेदार झापड़ .
मुझे भी तो बचपन से बड़प्पन तक
माँ ने ही दिलाया था ,
कुछ ख़ास होने का एहसास.
मैंने भी जब नौकरी की
मजबूरी से छोडा था घर ,
माँ ने दी थी आँसू से विदाई,
और बाद में भी चिट्ठीओं के साथ
आया करती थी उसकी रुलाई.
मुझे भी लगता था
उसकी वेदना के बारे में सबसे कहूँ.
बहुत दिनों से सोच रहा था ,
मैं भी माँ पर कोई कविता लिखूं.
पर इतने दिनों तक
मै क्यों नहीं लिख पाया,
माँ पर कोई कविता?


जबकि , मुझे भी तो
अपनी माँ से लगाव बहुत था.
और मैंने भी तो उसके सामने खुद को
माना था एक बच्चा हमेशा.
माँ से दूर गृहस्थी बसाने पर भी ,
माँ ही बनी रही थी मेरे घर की सर्वेसर्वा.
अपनी हरेक परेशानी में ,
माँ ने किया था मुझ पर विश्वास.
और, मैंने भी तो कभी नहीं होने दिया था
उसे निराश.
माँ को जब कभी पड़ी थी ज़रुरत मेरे सहारे की,
मै दौड़ कर पहुंचा था हर बार.
मैंने कभी बच्चों की पढाई, या
महानगरीय खर्चों की देकर दुहाई.
माँ की मदद से हाथ नहीं खींचा था.
मैंने माँ के लिए ,वह सब किया जो मेरा सामर्थ्य था,
जो मै कर सकता था.
बस नहीं कर सका तो इतना,
मै माँ पर नहीं लिख सका कोई कविता.

अधजली मोमबत्तियों का विरोध

हर बार जब महानगर पर होता है,
आतंक का तेज़धार हमला,
चलती हैं तडातड गोलियां,
बिखरते हैं शव पर शव,
जाने- पहचाने- अनजाने,
तब, निकल आते हैं सड़कों पर,
कुछ संभ्रांत किस्म के लोग,
हाथों में लिए हुए जली हुई मोमबत्तियां .
जली हुई मोमबत्तियों से वो जतलाते हैं,
अपना सांकेतिक विरोध,
अपना संयमित क्रोध,
और ताज़ा रिसते घावों की पीडा.
धीरे धीरे ,
जब हो जाती हैं , बहुत सारी
मोमबत्तियां इकठ्ठा एक साथ,
और चारों ओर चमकने लगता है
कुछ प्रकाश,
तो समझते हैं कि,
सफल हो गया हमारा विरोध,
कुछ संभ्रांत किस्म के लोग.
फिर टिका कर किसी सुनसान से किनारे पर
अपनी अधजली मोमबत्तियां,
मनाते हैं संतोष , कि
वे नहीं रहे चुप,
उन्होंने किया है आतंक का विरोध.
तब छोड़ कर वही पर ,
जली अधजली मोमबत्तियां,
चले जाते हैं घर,
कुछ संभ्रांत किस्म के लोग.
फिर धीरे धीरे , वो भूल जाते हैं,
जली हुई मोमबत्तियां,
भूल जाते हैं अपना विरोध,'
भूल जाते हैं तडतडाती गोलियां.
पर नहीं भूलता है वो,
जिसने चलवाईं थीं वे गोलियां.


संपर्क- संजीव निगम ,[मो. 9821285194]
sanjiv_nigam@yahoo.co.in
nigamsanjiv59@gmail.com


प्रस्तुतकर्ता-



-सुशील कुमार

11 comments:

मोहन वशिष्‍ठ 9988097449 September 28, 2009 at 5:11 PM  

सुशील जी संजीव निगम जी की कविताएं दिल को छू गई खासकर मां वाली बहुत ही बेहतरीन लिखते हैं इनका भी एक ब्‍लाग खुलवा दो ना प्‍लीज इनकी कविताएं पढवाने के लिए आपका बहुत बहुत धन्‍यवाद

दशहरे पर्व की आपको और सभी को हार्दिक शुभकामनाएं संजीव निगम जी को भी मेरी ओर से ढेर सारी शुभकामनाएं

Anonymous September 28, 2009 at 7:30 PM  

जानदार काविताएँ है, सम्पादक और कवि दोनो को बधाई!!

Rati Saxena September 28, 2009 at 7:31 PM  

जानदार काविताएँ है, सम्पादक और कवि दोनो को बधाई!!

PRAN SHARMA September 28, 2009 at 10:15 PM  

SANJEEV NIGAM JEE KEE SASHAKT
RACHNAAON NE BAHUT PRABHAVIT
KIYAA HAI.SANJEEV JEE NE KAVITAAON
KO JAESE SAJEEV KAR DIYAA HAI.

Dr. Omprakash sharma September 28, 2009 at 11:08 PM  

दौनो अच्छी कविताये है.

Sanjiv Nigam September 30, 2009 at 6:51 PM  

Kavitaon par pratikriyayen dene ke liye Mohan Vashishth, Rati Saxena, Pran Sharma aur Dr. Om Prakash Sharma .....aap sabko haardik dhanyvad.

सुशील कुमार October 2, 2009 at 8:35 PM  

संजीव निगम की कविता में सम्वेदना अपनी पूरी गहराई से पाठक के मन में उतरती है।

Devi Nangrani October 3, 2009 at 12:30 AM  

संजीव निगम की रचनायें मन मेज़ एक हलचल सी पैदा करती है. मार्मिक भी है और मन पर चाप चड़ने में सफल bhi
देवी नागरानी

Sanjiv Nigam October 3, 2009 at 6:36 PM  

Susheel ji, Devi Nagrani ji.....Dhanyvad. Sanjiv Nigam

अजेय October 4, 2009 at 7:00 AM  

सम्भ्रांत लोगों की मोम्बत्त्तियां
सम्भ्रांत लोगों का विरोध !

Suman October 5, 2009 at 9:10 AM  

पर नहीं भूलता है वो,
जिसने चलवाईं थीं वे गोलियां.nice

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