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  रति सक्सेना की कवितायें -

Sunday, September 20, 2009

परिचय: डा.रति सक्सेना हिंदी की उन थोड़े से मूर्द्धन्य कवयित्रियों में से हैं जिनकी काव्य-रचना प्रक्रिया से गुजरते हुए मुझे यह भासमान होता है कि उन्होंने कविता की स्थापित क्लासिकी और वर्जनाओं पर अपना ध्यान ज्यादा केन्द्रित नहीं किया, बल्कि खुद की अपनी क्लासिकी विकसित की, अपने नये मुहावरे विकसित किये और समकालीन कविता में बिना लाग-लपेट के प्रवेश किया, जिस कारण हिंदी समालोचकों की दृष्टि उधर गयी नहीं, या कहें कि जब-तब वक्रदृष्टि ही रही। पर उसकी चिंता किये बिना वह निरंतर काव्य-वर्जनाओं के विरुद्ध कविता के नये प्रतिमान की तलाश में तल्लीन रही हैं।...और अब उनकी कृतियाँ न मात्र वैश्विक साहित्य से जुड़ रही हैं बल्कि भारत से भी बाहर उनकी अभिनव पहचान बन रही हैं। अब तक हिन्दी में उनकी चार ( माया महाठगिनी, अजन्मी कविता की कोख़ से जन्मी कविता, सपने देखता समुद्र और एक खिड़की आठ सलाखें), अंग्रेजी में दो, मलयालम में एक ( अनूदित ) और इतालवी में एक कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं । (हिन्दी में दो और कविता संग्रह तथा अंग्रेजी में एक कविता संग्रह शीघ्र प्रकाशन की प्रतीक्षारत) देश की करीब-करीब सभी भाषाओं में रति सक्सेना की कविताएँ अनूदित हुईं हैं। कई कविताओं के अनुवाद अंग्रेजी में अन्य देशों की पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुए हैं। ईरान की Golestaneh नामक पत्रिका में रति सक्सेना की कविताओं और जीवन को लेकर एक विशेष अंक निकाला गया है। अंग्रेजी पत्रिका andwerve में रति सक्सेना से विशेष भेंटवार्ता प्रकाशित की गई है। रति सक्सेना ने कविता और गद्य की 11 पुस्तकों का मलयालम से हिन्दी में अनुवाद भी किया है जिसके लिए उन्हें वर्ष 2000 में केन्द्र साहित्य अकादमी का अवार्ड मिला। मलयालम की महान कवयित्री बालामणियम्मा को केन्द्र में रख कर उन्होंने एक आलोचनात्मक पुस्तक भी लिखी - “बालामणियम्मा - काव्य कला और दर्शन”। रति सक्सेना का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है अथर्ववेद को आधार बना कर लिखी पुस्तक " ए सीड आफ माइण्ड‍ - ए फ्रेश अप्रोच टू अथर्ववेदिक स्टडी" जिसके लिए उन्हें “इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र" फेलोशिप मिली। रति सक्सेना की दो पुस्तकें अथर्ववेद के प्रेमगीत, जिनमें वेदों के अनजाने पक्ष को प्रस्तुत किया गया है, प्रकाशित एवं चर्चित हुई हैं।
आपकी वेब पत्रिका कृत्या नेट पर हिन्दी कविताओं का नया मानदंड रच रही है।
आपको इटली के मोन्जा ( Monza) में छह महीने तक चलने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम Poesia presente 2009 in Monza में विशेष रूप से आमन्त्रित किया गया है, रोम में of Mediterranea Festival में विशेष कविता पाठ का भी आमन्त्रण मिला है। अभी आपको नोर्वे के Stavanger नोर्वे दिवस के उपलक्ष्य में कृत्या और भारतीय कविता पर बोलने के लिए भी आमंत्रित किया गया है।]

रति सक्सेना की आगामी पुस्तकें हैं-‍ यात्रा वृतांत - ‘चींटी के पर’( हिन्दी में), अय्यप्पा पणिक्कर पर (अंग्रेजी में) और कृत्या- चार कदम -(हिन्दी और अंग्रेजी में)
डा. रति सक्सेना की काव्यात्मकता पर यहाँ भी पढ़ें- सृजनगाथा-मूल्याकंन स्तंभ


          लघु-कवितायें:-
एक-


मेरे मुँह में जीभे हैं,
कई रंग और कई स्वाद
कई प्रास-अनुप्रास लिये


शुरु में मेरे पास
केवल एक जीभ थी
जिसे मैं सुबह-सुबह लगा लेती थी
और रात को हवाले कर देती थी नींद के


मुझे पता ही नहीं लगा
कब वह बढ़ती गई ग्वार पाठे सी
विभक्त होती हुई
दो, तीन और चार शाखाओं में


नींद अब भी बतिया लेती थी
जीभों के सहारे
दिन भूल जाते थे गिनती
और सपने हो गए गूंगे
इतनी जीभों के रहते हुए भी


मेरे पास अपनी कोई भी जीभ नहीं

दो-

नाम याद रखना कितना कठिन है
उसने समझ लिया था
पाँच बरस की उम्र में ही


वह भी जबकि
नाम एक से ज्यादा हों,
और यह जानना भी जरुरी हो कि
पूछने वाला कौन है


नाम से भी ज्यादा मुश्किल था,
प्रार्थनाएँ रटना
मन को यह समझाते हुए कि
यह उसकी अपनी नहीं है


प्रार्थना बहुत सी हों,
कोई फर्क़ नहीं पड़ता


जरूरी है कि
वह नाम की तरह किसी दूसरे से
उधार न ली गई हों।

तीन-


इन दिनों मैं
भूलने लगी हूँ
चीजें, संभालकर
रखने पर भी


खोजना शुरु करती हूँ
एक प्रक्रिया की तरह
पर भूलती जाती है
याद के कुन्दों में अटक कर


भूल पानी की सतह पर तैरती
याद तली में जाकर छिप जाती है
दोनों के झगड़े में
वे सब चीजें मिलती जातीं
जिन्हें भूलना भी मैं भूल चुकी थी


और सब तो ठीक था
पर आज सवेरे- सवेरे लगा कि
भूल गई हूँ तुम्हारी याद भी
कहीं रख कर


कहीं मिल ना जाएँ
कुछ और यादें
भूली हुई जन्मान्तरों की
यह सोच कर
खोजने की कोशिश नहीं करती


इन दिनों मैंने चीजों को
संभालकर रखना बन्द कर दिया है।

चार-


स्याही से भींगा
मेरा हर एक अक्षर
स्याह कागज पर उतरते ही
रेंग जाता है जमीं पर


मैं बेहद चाहती हूँ कि
स्याही का जिगर हो जाए सफेद-झक्क
बगुले की तरह अक्षर
दौड़ लगाए आसमान में
पर कलम कर देती है इंकार


अक्षर नहीं चाहते बनना तारे
वे बस रेंगते हैं ज़मीन पर


उनकी इसी जिद से
मेरी ज़मीन उपजाऊ होती जाती है

पाँच-

रेत की लहरों पर बिछी
काली रात है ज़िन्दगी
मौत है
लहराता समुन्दर


समुन्दर के सीने पर
तैरती लम्बी डोंगी है ज़िन्दगी
मौत है
फफोलों से रिसती समुन्दर की यादें


यादों की ज़मीन पर
उगी घास पतवार है ज़िन्दगी
मौत है
हरियाली की भूरी जड़ें


चाहे कितनी भी लम्बी हो
मौत की परछाई है ज़िन्दगी

छ:-


वह खिलती है
दरख्त की शाखाओं पर
गुडहल के फूल सी
नुकीले दाँतों और पंजों को पसार
आमंत्रित करती है
काम मोहित मकड़े को


मकड़ा जानता है
भोग उसका नहीं
फिर भी आनन्दित है
मकड़ी देह पर
जो कसती है पंजे
ज़िन्दगी के मकड़े पर
वह भागता है छटपटाता हुआ


फिर लौट आता है अंध मोहित
अन्तत मौत निगल लेती है
घायल ज़िन्दगी को
आरंभ होती है सर्जन किया
मौत की आनन्द के जालों पर
फिर से जनमने लगती है |

प्रस्तुति-

-सुशील कुमार।

12 comments:

सुभाष नीरव September 20, 2009 at 9:28 PM  

भाई सुशील जी, ब्लॉग की काली पृष्ठभूमि पर कविताएं पढ़ने में नहीं आ रही हैं। रंग -संयोजन ठीक करे ताकि कविताएं पढ़ी जा सकें।

सुशील कुमार September 20, 2009 at 10:26 PM  

भाई सुभाष नीरव जी, उस वक्त मैं बैकग्राऊंड इमेज को सेट कर रहा था। अब लगभग रंग-संयोजन ठीक खो गया है।

प्रदीप कांत September 20, 2009 at 10:29 PM  

चाहे कितनी भी लम्बी हो
मौत की परछाई है ज़िन्दगी

EK JEEVAN DARSHAN

अशोक सिंह September 20, 2009 at 11:18 PM  

रति जी हिन्दी में कविता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं।-अशोक,दुमका।

अशोक सिंह September 20, 2009 at 11:19 PM  

आपकी कवितायें कुछ कठिन हैं पर लाजबाव भी।

अविनाश वाचस्पति September 20, 2009 at 11:21 PM  

कवितायें अच्‍छी हैं
पर इतनी सारी।

RAJESHWAR VASHISTHA September 20, 2009 at 11:51 PM  

इतनी अच्छी कविताएँ........इतनी खराब ..बदरंग चादर पर फैला दी गईं......... शहद था चाट लिया......

रवि कुमार, रावतभाटा September 20, 2009 at 11:53 PM  

रति जी की कविताओं से पहली बार गुजरना हुआ...

और एक अनोखी ताज़गी का अहसास हुआ...

संगीता पुरी September 21, 2009 at 6:40 AM  

एक बार आपने उनके ब्‍लाग का भी लिंक दिया था .. मैने पढा था उनको .. तब भी पढकर अच्‍छा लगा था .. आज भी अच्‍छा लगा !!

Suman September 21, 2009 at 8:41 AM  

फिर लौट आता है अंध मोहित
अन्तत मौत निगल लेती है
घायल ज़िन्दगी को
आरंभ होती है सर्जन किया
मौत की आनन्द के जालों पर
फिर से जनमने लगती है |nice

विपिन बिहारी गोयल September 21, 2009 at 9:16 AM  

ये कवितायेँ हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि हैं.

Anonymous September 21, 2009 at 1:42 PM  

Rati ji kee kavita ka rasaswadan karaane kee kritagyn hoon!
-Rekha Maitra

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