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  कविवर एकान्त श्रीवास्तव की कवितायें -

Sunday, September 13, 2009


    • छवि: एकान्त श्रीवास्तव-
परिचय- आप विगत दो वर्षो से भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता की मानक पत्रिका ‘वागर्थ’ के संपादक हैं। समकालीन कविता में आपका योगदान अविस्मरणीय रहा है जो आपके लेखन से ही स्वस्पष्ट है। हिन्दी के प्रखर आलोचक डा. नामवर सिंह जी के शब्दों में -
‘अन्न हैं मेरे शब्द’ से अपनी काव्य-यात्रा आरम्भ करने वाले एकान्त आज भी विश्वास करते हैं कि ‘जहाँ कोई नहीं रहता/ वहाँ शब्द रहते हैं।’ आज जब चारो ओर ‘शब्द पर हमला हो रहा है,एकान्त उन थोड़े से कवियों में हैं जो ‘शब्द’ को अपनी कविताओं में एक नया अर्थ दे रहे हैं।" 
आपकी कविताओं की जो अन्यतम विशेषता है वह यह कि आपने हिन्दी कविता को लोकचेतना और जनपदीय संघर्ष से जोड़कर देखने का एक सार्थक और निराला पहल किया है जो समकालीन हिन्दी के लिये गर्व का विषय हो सकता है,‘जहाँ शब्दों की महक़ से/ गमकता है कागज का हृदय/ और मनुष्य की महक़ से धरती।’ इसलिये आप, नामवर जी के ही शब्दों में "यह याद दिलाना नहीं भूलते कि ‘दिन-ब-दिन राख हो रही इस दुनिया में/ जो चीज़ हमें बचाये रखती है/ वह केवल मनुष्यता की महक़ है।’
एकान्त श्रीवास्तव के चार कविता-संग्रह के अतिरिक्त एक गद्यकृति 'कविता का आत्म-पक्ष’ भी समान रूप से चर्चित हुई है। आप ‘शरद बिल्लौरे स्मृति’, ‘ऋतुगंध’,‘ठाकुर प्रसाद स्मति’ "दुष्य़ंत कुमार", "केदार", डा.नरेन्द्र देव वर्मा सम्मान जैसे कई विशिष्ट सम्मानों से भी नवाजे जा चुके हैं।

सम्पर्क- हिन्दी टीचिंग स्कीम, २३४/४ फ्लैट न.-१८,द्वितीय एम एस ओ बिल्डिंग,निजाम पैलेस,ए जी सी बोस रोड, कोलकाता-७०००२

आपकी कुछ कवितायें-

दु:ख  

दु:ख जब तक हृदय में था
था बर्फ की तरह
पिघला तो उमड़ा आँसू बनकर
गिरा तो जल की तरह मिट्टी में
रिस गया भीतर बीज तक
बीज से फूल तक

यह जो फूल खिला है टहनी पर
इसे देखकर क्या तुम कह सकते हो
कि इसके जन्म का कारण
एक दु:ख था ?

पत्तों के हिलने की आवाज़

तुम एक फूल को सूँघते हो
तो यह उस फूल की मह्क है

शब्दों की महक से
गमकता है काग़ज़ का हृदय
कस्तुरी की महक से जंगल
और मनुष्य की महक से धरती

धरती की महक मनुष्य की महक से बड़ी है
मगर धरती स्वयं
मनुष्य की महक और आवाज़ और स्वप्न
से बनी है

दिन-ब-दिन राख हो रही इस दुनिया में
जो चीज़ हमे बचाये रखती है
वह केवल मनुष्य की महक है

और केवल पत्तों के हिलने की आवाज़

ताजमहल

तुम प्रेम करो
मगर ताजमहल के बारे में मत सोचो
यों भी यह साधारण प्रेमियों की हैसियत से
बाहर की वस्तु है

अगर तुम उस स्त्री को- जिससे तुम
प्रेम करते हो- कुछ देना चाहते हो
तो बेहतर है कि जीवन रहते दो
मसलन कातिक की क्यारी से
कोई बड़ा पीला गेंदे का फूल
यह अधिक जीवंत उपहार होगा

यों भी इतिहास गवाह है
कि जो ताजमहल बनाता है
उसके दोनों हाथ काट दिये जाते हैं ।
***
प्रस्तुतकर्ता-
-सुशील कुमार।

14 comments:

सुभाष नीरव September 13, 2009 at 10:30 AM  

एकान्त श्रीवास्तव जी मेरे प्रिय कवियों में से हैं। इनकी कविताओं में भाव और विचार की जो सहजता होती है, वह मुझे अपनी ओर खींचती रही है। 'सबद लोक' में यहां प्रकाशित पहली दो कविताएं प्रभावित करती हैं।

Nirmla Kapila September 13, 2009 at 11:04 AM  

बहुत सुन्दर और गहरे भाव लिये हैं कवितायें एकान्त जी को बहुत बहुत शुभकामनायें

भूतनाथ September 13, 2009 at 12:46 PM  

एकांत जी की बात ही कुछ और है....मैंने उन्हें पढ़ा भी है और सूना भी....गज़ब....अद्भत हैं वो...!!
अरे वाह क्या बात है...आज मैं पहली बार सीधा हिंदी में लिख पा रहा हूँ....इसी से मुझे सुविधा भी होती है....इसे किस तरह किया जा सकता है,क्या यह ऑफ लाइन भी संभव है....??इस सम्बन्ध में कृपया मुझे जानकारी उपलब्ध करवायें,इसके लिए मैं आपका आभारी रहूंगा सच...!!

अमिताभ श्रीवास्तव September 13, 2009 at 4:43 PM  

ekantji ki rachnaye hraday ko chhune vaali hoti he/ aour yahi khaasiyat rachna ko safal banaati he/ pahli do kavitao ne bhaav-vibhor kiya/

अविनाश वाचस्पति September 13, 2009 at 4:48 PM  

फूल की इंसानी महक
फूल जो दुख से बना
और फिर प्‍यारी स्‍त्री को
दे दिया वही फूल तोड़कर
उसकी महक के साथ
और ताहमहल बनाने के जुर्म में
कटवा लिए हाथ।

Uloook September 13, 2009 at 5:21 PM  

बहुत सुन्दर !!

shama September 13, 2009 at 6:52 PM  

पहले तो बधाई स्वीकार करें ! स्वस्थ रहें...हमेशा! ...मैंने एकांत श्रीवास्तव जी को कम पढ़ा है ...लेकिन इतना याद है कि, उनपे टिप्पणी देनेके काबिल मै नही...जिन्हें जनम दिन की बधाई मिल रही है, वो खुशकिस्मत ज़रूर हैं!

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Anshu Bharti September 13, 2009 at 9:49 PM  

sentimental and heart-touching poems by Ekant jee, Thank you.

PRAN SHARMA September 13, 2009 at 11:51 PM  

EKAANT SHREEVASTAV ACHCHHE KAVI HAIN.UNKEE KAEE KAVITAAYEN MAINE
PADHEE HAIN.UNKEE KAVITAAON KEE
VISHESHTA HAI KI SEEDE-SAADHE
SHABDON MEIN SARAS AUR SUNDER
BHAVABHIVYAKTI.KABHEE-KABHEE MAIN
SOCHTAA HOON KI UNKE BHAAV CHANDO-
BADDH KAVITA KE LIYE KITNE UPYUKT
HAIN.UNKEE TEENON KAVITAYEN MUN KO
CHHOO GAYEE HAIN.BADHAAEE.

Anonymous September 15, 2009 at 1:49 PM  

सुशील जी
आपकी रचना धर्मिता और ऊर्जा देख कर दंग हूं कितनाकाम कररहे हैं आप । ये
नयी पत्रिका बेहतरीन संयोजन का नमूना है। आपको फोन किया लेकिन ऑफ मिला।
आसकपी मदद चाहिये।
-suraj prakash

Anonymous September 15, 2009 at 1:54 PM  

ekant ji kee kavita kee sanjhedaaree kee shukraguzaar hoon !
-Rekha Maitra

Anonymous September 18, 2009 at 8:15 PM  

सुशील जी , आपकी मेहनत और लगन देख कर अचम्भित हूँ।

रति सकक्सेना

प्रदीप कांत September 19, 2009 at 10:39 PM  

यों भी इतिहास गवाह है
कि जो ताजमहल बनाता है
उसके दोनों हाथ काट दिये जाते हैं ।

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एकान्त जी की यह बेहतरीन कविता पढ़ कर एक पुराना किन्तु उम्दा शेर याद आ गया -

पत्थर तराश कर न बना ताज एक नया
फ़नकार की जहान मे कटती है उंगैलियाँ

सुरेश यादव October 5, 2009 at 6:56 PM  

सुशीलकुमार जी को समाया पर बधाई तो नहीं दे सका पर हमारी परंपरा में जग जग जियो की शुभ कामनाएं तो मैं देही सकता हूँ और दे रहा हूँ.इसी बहाने एकांत श्रीवास्तव की बहुत सुन्दर कवितायेँ पढ़ी .इस कवी में ताज़गी है धन्यवाद,

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