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  लावण्या शाह की ताज़ा कविताएँ-

Sunday, September 6, 2009

छवि - लावण्या शाह :
परिचय- लावण्या शाह सुप्रसिद्ध कवि स्व० श्री नरेन्द्र शर्मा जी की सुपुत्री हैं और वर्तमान में अमेरिका में रह कर अपने पिता से प्राप्त काव्य-परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं।समाजशा्स्त्र और मनोविज्ञान में बी.ए.(आनर्स) की उपाधि प्राप्त लावण्या जी प्रसिद्ध पौराणिक धारावाहिक "महाभारत" के लिये कुछ दोहे भी लिख चुकी हैं। इनकी कुछ रचनायें और स्व० नरेन्द्र शर्मा और स्वर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर से जुड़े संस्मरण रेडियो से भी प्रसारित हो चुके हैं। इनकी एक पुस्तक"फिर गा उठा प्रवासी" प्रकाशित हो चुकी है जो इन्होंने अपने पिता जी की प्रसिद्ध कृति " प्रवासी के गीत" को श्रद्धांजलि देते हुये लिखी है।
प्रस्तुत हैं ,
कुछ अमूल्य साहित्यिक कृतियों से
शब्द-भाव रुपी लघु-चित्र

श्री कृष्ण उवाच : भगवद` गीता से

[ १ ]
पवन की गति में,
गन्ने की मिठास में,
धृत, ज्यूं दुग्ध में,
रस ज्यों फलों में
सुगंध ज्यों पुष्प में,
मैं, समाया, हर जीव में !
सूफी नज़्म : रूमी की

[ 2 ]
वो लहर जो अनाम सी
या, खुदा ए पाक सी
तोड़ कर जो बह चली
जिस्म के मर्तबान सी ,
टूट बिखरी हर कीरच में,
नूरे रोशनी , उस एक की ,
रवानी बहते दरिया की
डूबता , जा कर , सब , उसी में -
ऋग्वेद ऋचा:'उषा'

[ ३ ]
स्वर्णिम रंग रक्तिम झीने
उषा के अरुणिम भाल पे
आभा आलोक का पटल
देवदूती , अप्सरा चित्र सम
खचित , दीव्य ग्रन्थ माला
हैं , द्रष्ट , दीशा आकाश में !
क्षुद्रक रचित "मृच्छकटिकम से"

[ ४ ]
कदम्ब पुष्प, मेघ जल से स्नात
स्खलित जिससे एक जल कण,
बह चला नर्म ग्रीवा मार्ग से,
सर्र ...सर्र ...सर र र ...
सुन्दरी के गुंथे केश पाश से,
अभिषेक है क्या किसी ऐसे
कुंवर का, उत्तराधिकारी जो
किसी महान राजवंश का?

स्वर्ण मृग मरीचिका

देख लिया मृग नयनी ने मृग
सफल हुई, माया मारीच की
स्वर्ण मृग भागे, पंचवटी के आगे,
राघव, लघु भ्राता, चकित, निहारें !
कहे जानकी, "आर्य ! मृग , स्वर्णिम ,
स्वामिन` करें आखेट , इस मृग का !"
बोले तब राम, "सुनो जानकी, यह माया
खेल रही बन मृगया , यह् भ्रम है !"
धनुष डोर कस, खड़े हैं , लक्ष्मण,
" आज्ञा प्रभू ! दे दूं क्या मुक्ति ?"
देख रहे अनुज को राघव,
स्नेहिल नयन से , मृदु बोले,
" जानकी , का आग्रह है,
मुझको ही जाना है भाई ,
तुम्हे सौप सुरक्षा, हूँ निश्चिंत !"
"जो आज्ञा .." कर बध्ध झुकाते शीश
लक्ष्मण को छोड़, चले राम रघुराई ..
आगे आगे, माया मृग भागे,
पीछे पीछे, मायापति, हैं जाते,
विधि विडंबना, विचित्र घटी ,
जीव के पीछे ईश्वर हैं जाते ...
शर संधान, छूटा ज्यों तीर ,
गूँज उठी कपटी पुकार वन में,
"लक्ष्मण ! हत हुआ मैं ! "ये कैसा स्वर ?
श्री राम का स्वर मृग दोहराता ..
लक्ष्मण चकित, जानकी सभीत ,
"देवरजी, दौडो , वे घायल हुए क्या?"
कह माँ जानकी , उठ खडी हुईं उद्विग्न
"माता ! यह् संभव नहीं हैं वे अजेय !"
प्रणाम करते लखन लाल हुए सम्मुख
"जाओ...लालजी , ना देर करो -
नाथ पुकारते, न अब देर करो"
कहें जानकी बारम्बार, चिंतित हो
लेकर ठंडी सांस, सौंप सब अब
विधि के रि हाथ, चलपड़े लखन,
खींची 'लक्ष्मण-रेखा' कुटी के द्वार
"माँ यह् सीमा सुरक्षित क्षेत्र की !
ना करना पार , चाहे कुछ भी हो जाए"
कह, चल पड़े लखन लाल जी उदास ,
"ठीक है, शीघ्र जाओ , वहीं जहां से
मेरे स्वामी का स्वर है आया"
सुन सीता की आर्त पुकार, चले
लक्ष्मण, लिए संग धनुष बाण
राक्षस मारीच मुक्ति पा रहा,
प्रभू दर्शन का सुफल जय गा रहा,
क्षमा प्रभू ! धन्य हुआ ..मैं नराधम
स्वयं ईश्वर शर से मेरा अंत हुआ !"
प्रभू राम हँसे, थी यह् लीला भी उनकी ही
प्रभू अयन, रामायण का यह् भी द्रश्य था
दिखे तभी लघु भ्राता आते हुए मार्ग पे ,
जान गए जानकी नाथ, आगे क्या होगा ,
नहीं रहेंगी जानकी, पंचवटी में , जब् ,
लौट कर जाऊंगा, दारुण व्यथा सभर,
रावण-वध के महा यग्न की प्रथम
आहूति , सीता मिलेंगी अग्नि कुंड से ..

पोस्टकर्ता -

-सुशील कुमार।

21 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi September 6, 2009 at 9:03 AM  

बहुत गंभीर अर्थ देतीं सहज कविताएँ हैंय़

वाणी गीत September 7, 2009 at 6:39 AM  

अद्भुत कवितायेँ ..!!

Udan Tashtari September 7, 2009 at 6:55 AM  

वाह!!

गजब एवं अद्भुत!!

आनन्द आ गया इन नायाब रचनाओं को पढ़्कर.

लावण्या जी को बहुत बहुत बधाई.

डॉ.राधिका उमडे़कर बुधकर September 7, 2009 at 9:33 AM  

बहुत ही सुंदर रचनाये .अद्भुत

Aflatoon September 7, 2009 at 10:33 AM  

पढ़कर अच्छा लगा । लावण्याजी , बधाई ।

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey September 7, 2009 at 11:12 AM  

ओह, सरल से शब्दों से इतने गूढ़ अर्थ के प्रयोग सम्भव हैं! पढ़ कर मैस्मराइज करता आनन्द आया!
नये शब्दों में भारत की दार्शनिक साहित्यिक विरासत बखूबी समेटी है!

अजित वडनेरकर September 7, 2009 at 12:15 PM  

बहुत सुंदर और भाव प्रवण रूपांतर है लावण्या दी।
जिस्म का मर्तबान...यह प्रयोग मनभावन लगा।
भाषांतर का यह प्रयोग जारी रखियेगा।

नीरज गोस्वामी September 7, 2009 at 12:28 PM  

लावण्या जी की लेखनी ही इतने जटिल विषयों को इतनी सरलता से प्रकट कर सकती है...अद्भुत बेमिसाल रचनाएँ हैं सारी की सारी...
नीरज

संगीता पुरी September 7, 2009 at 12:37 PM  

ये रचनाएं गजब की है .. लावण्‍याजी की लेखनि का जबाब नहीं !!

Anshu Bharti September 7, 2009 at 12:41 PM  

भारतीय पर्म्परा का पोषण करती अत्यंत अच्छी कबितायें।

रंजना September 7, 2009 at 3:06 PM  

आत्म्विमुग्ध कराती अतिसुन्दर कवितायेँ......Aabhar.

सुशील कुमार September 7, 2009 at 4:13 PM  

लावण्या शाह का कवि भारतीय भाव-बोध का खोजी-कवि है जो कवयित्री को एक ऐसे जनमानस के सृजन में उत्प्रेरणा देता है जहाँ पाठक-वर्ग अपनी ज़मीन के परम्पराओं और आदर्शों का अप्रतिम चिन्ह पाते हैं। एक प्रवासी कवयित्री के कलम से यह शब्द-कर्म सचमुच तप के बराबर है।

vijay gaur/विजय गौड़ September 7, 2009 at 5:40 PM  

रूपांतरित कविताओं को पढ़ना एक अनुभव से गुजरना है| बधाई|

PRAN SHARMA September 7, 2009 at 6:08 PM  

SABHEE KAVITAYEN EK SE BADH KAR EK
HAI.LAVANYA JEE SAMARPIT SAHITYAKAR
HEE NAHIN HAIN EK BAHUT ACHCHHEE
INSAAN BHEE HAIN.MUJHSE VE CHHOTEE HAIN LEKIN UNKAA KRITITV
AUR VYAKTITV MERE LIYE ANUKARNIY
V AADARNIY HAI.

मीनाक्षी September 7, 2009 at 8:28 PM  

शब्द शैली हो या भाव..दोनो ही प्रभावशाली...

लता 'हया' September 9, 2009 at 5:24 AM  

shukria.

sabad lok aur is se jude tamam sambhashi ek sambodhi se {complete knowledge} kam nahin.

congs to every poet and u.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन September 11, 2009 at 12:43 AM  

बहुत सुंदर रचनाये!
लावण्या जी को बहुत बहुत बधाई!

Suman September 11, 2009 at 9:26 PM  

सच का सामना में
पत्‍नी के खुलासे के बाद......nice

रश्मि प्रभा... September 13, 2009 at 8:12 PM  

हर कविताओं का अपना अलग-अलग आकर्षण है

hasyvangya April 30, 2011 at 1:40 PM  

aapki ki kavita sahaj saral evm prabhavkari hai. Padhkar bahut achchha laga

Virendra Chaturvedi October 22, 2015 at 9:54 PM  

जनपदीय चेतना का संस्पर्श !महत्व की बात !

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