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  कविवर विजेन्द्र की ताज़ा कविताएँ

Sunday, August 30, 2009

  • कविवर विजेन्द्र की ये ताज़ा कविताएँ उनसे अनुरोध कर फोन से प्राप्त किया गया है। चौहत्तर की वय पार कर चुके कविवर विजेंद्र के लगभग चार दशकों से उपर के दीर्घ कालखंड में समाये कविकर्म और सौंदर्यदृष्टि को देखकर यह सहज ही लक्ष्य किया जा सकता है कि हिन्दी-काव्याकाश में निराला और त्रिलोचन की परंपरा के एक अत्यंत दृष्टिसंपन्न कवि के रुप में उनका उगान हुआ है जो आज अन्यत्र विरल है, और जिसकी दीप्ति एक लंबे अरसे तक कवियों और उनके पाठकों को आलोकमान करेगी ।
    कविताओं के पीछे आपकी काव्यमीमांसा का अपना ठोस सैद्धांतिक पक्ष है जिसकी जडे इस देश की लोक-परम्परा में हैं। कविता में आप जो कुछ भी कहते हैं, उसे साथ-साथ अपनी परम्परा और जातीय साहित्यनिष्ठा से प्रमाणित भी करते चलते हैं। इसलिये आपकी कल्पना बहुत साफ़ और बोधगम्य रही है। आप अंग्रेजी भाषा सहित्य के विद्वान भी हैं और पाश्चात्य काव्य-सौंदर्य-शिल्प का सघन ज्ञान है । पर कविता में आप उन्हीं वस्तुओं का आश्रय लेते हैं या समर्थन करते हैं जिनका अपना भारतीय मूल्य जीवित रह सकता है। इसलिये कहा जा सकता है कि आप एक संस्कारवान कवि-चिंतक हैं जिनके यहाँ सौंदर्यचिंता में विचार और उनकी कविता का स्वभाव सदैव एकमेक रहा है और जो किसी तृष्णा या लोभ में फँसकर अपने आसन से कभी च्युत नहीं हुए । आपकी कविताओं में जो गहन पार्थिवता है उसका संकेत इस बात से भी मिलता है कि आपका शब्दकर्म शुरु से ही जन का पक्षधर रहा है न कि अभिजन का। आप लोक और जन के प्रतिबद्ध रचनाकार रहे हैं। आपकी काव्य-सौंदर्यदृष्टि में मार्क्सवादी सौंदर्यचिंतन लोक के सौंदर्यबोध के साथ इतना घुलमिलकर पाठक के समक्ष प्रस्तुत होता है कि ऐसा विरल संयोग आप जैसे कुछ ही कवियों के यहाँ ही विपुलता से गोचर होता है, जबकि बुर्जुआ कलावादी कवि भाषा की बात भाषा से शुरु करके भाषा पर ही समाप्त कर देना चाहते हैं यानि जीवन. प्रकृति, समाज से वंचित करके काव्यात्मकता को यथास्थिति की हद तक ही रखना चाहते हैं जिससे आपका विरोध है। आप कविता में गहनता से जीवन. प्रकृति और समाज का संस्पर्श करते हैं। और सिर्फ़ संस्पर्श ही नहीं करते, उसके भीतर आत्यांतिक सहजता और निस्पृहता से प्रवेशकर उसके सौंदर्य का खनिज भी ढूँढते हैं। साथ ही एक चित्रकार होने के कारण आपकी चित्रात्मक सोच-शैली का प्रभाव भी आपके पूरे साहित्य पर पड़ा है। आपके चित्रों की तुलना आपकी कविता से करने से यह सहज ही लक्ष्य किया जा सकता है कि आपके सारे चित्र भी एक तरह से अनबोलती कविताएँ ही हैं जिसमें लिपिहीन सौंदर्य का झलक मिलता है, जहाँ कहें कि इसकी सौंदर्यशास्त्रीयता में आपकी कविता के सौंदर्य का ही प्रतिरुप भासित होता है। अतएव आपकी कविताओं के प्रतिमान का दायरा वृहत्तर और गहरा है जो आपकी सतत अध्ययनशीलता, निरंतर विकसित होती लोकपरक सौंदर्यदृष्टि और विचारप्रक्रिया की क्रमिक सुदृढता का परिणाम है।
    'त्रास’ (1966) से अपनी काव्ययात्रा आरंभ करने वाले इस मनीषी कवि की अब तक कुल तेरह कविता-पुस्तकें और तीन गद्यकृतियाँ 'कविता और मेरा समय(2000), 'सौंदर्यशास्त्र : भारतीय चित्त और कविता’ (2006),
    और ’कवि की अंतर्यात्रा(संस्मरण-2008)आ चुकी हैं ।
    सम्मान- राजस्थान साहित्य अकादमी से सर्वोच्च मीरा पुरस्कार। प्रथम ’पहल’ सम्मान।के.के. बिरला फाउंड़ेशन के बिहारी पुरस्कार ।
    संप्रति- पिछले दो दशकों से लोक चेतना की प्रसिद्ध पत्रिका ’कृति-ओर’ का संपादन। अब प्रधान संपादक। चित्रकला और स्वाध्याय।
    संपर्क- सी-133, वैशाली नगर, जयपुर- 302021
    दूरभाष- 01412351305

    कविवर विजेन्द्र की चार ताज़ा कविताएँ :

    एक-

    अन्दर ही अन्दर काँपता हूँ
    हवा से पत्तियाँ जैसे
    लहरें

    जब आत्मा का ही सौदा हो चुका है
    तो मेरे पास सुनाने को
    अब रहा क्या है?

    दो-

    तुम्हें कठोर जीवन जीते-जीते
    वह सहज लगने लगा है
    उठो और जागो,
    मनुष्य जीवन सिर्फ़ दासता के लिये नहीं
    प्यार में करुणा ही नहीं, प्रतिरोध भी है
    तुम कहो वे बातें
    जिससे औरों को भी
    मुक्त होने का साहस मिले।

    तीन

    पतझड़ के बाद वसंत जरुर आयेगा
    भले ही मैं उदासी के गान गाऊँ,
    बड़े उल्लास से आती है हर सुबह
    हम दोनों एक साथ
    उसे क्रियाओं में मूर्त करते हैं
    फिर कुछ नहीं
    न तिनका
    न सूर्य-कण
    न बूँद
    न हवा।

    चार-

    मेरे लिये तुम
    एक आँच का फूल हो
    एक पका सेव हो
    एक बालक की हँसी हो
    मेरे लिये तुम

    एक गीली शाख हो
    एक सूखा तिनका
    पाँव का ताज़ा निशान हो

    जल में हिली छाया
    पत्थर की खुरदुराहट
    और बादल का घनापन हो

    मेरे लिये तुम जीवित बाँह,
    नहायी धरती की देह हो मेरे लिये।

    प्रस्तुतकर्ता: सुशील कुमार

12 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi August 30, 2009 at 9:40 AM  

अच्छा लगा विजेन्द्र जी की रचनाएँ पढ़ कर!

Anonymous August 30, 2009 at 12:35 PM  

विजेन्द्र जी आधुनिक हिन्दी कविता के शायद एक सबसे महत्त्वपूर्ण कवि हैं। त्रिलोचन, नागार्जुन, केदार, शमशेर के बाद की पीढ़ी में अब हम विजेन्द्र, ऋतुराज, भगवत रावत और नरेश सक्सेना
के अलावा विष्णुचन्द्र शर्मा और मलय जी का ही नाम ले सकते हैं। ये ही छह कवि अब हिन्दी कविता के सिरमौर हैं। जिनमें विजेन्द्र सबसे ऊपर हैं। सुशील भाई! आपको बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने इतने बड़े कवि की नई कविताओं का रसास्वादन कराया। विजेन्द्र जी की तस्वीरें लगता है आपके पास नहीं हैं। मैं आपको आज उनकी कुछ तस्वीरें अपने पास से ढूँढ़ कर भेजूंगा।
ऐसे ही नई से नई और अच्छी से अच्छी पोस्ट भेजते रहें। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ-
सादर
अनिल जनविजय

समयचक्र August 30, 2009 at 2:45 PM  

bahut sundar rachanaaye. abhaar.
समयचक्र: चिठ्ठी चर्चा : ये चिठ्ठी शानदार तो नहीं है पर सबको साथ लेकर चलने वाली है .

अरविन्द श्रीवास्तव August 30, 2009 at 3:04 PM  

आदरणीय विजेन्द्र जी के प्रति आरम्भ से ही सम्मान रहा...कवि, चित्रकार व संपादक के रूप में उन्हें नमन करता हूँ...कृति ओर इधर नहीं देख पाया हूँ.. शुभकामनाएं.

सुलभ सतरंगी August 30, 2009 at 5:29 PM  

विजेन्द्र जी को पढ़कर अच्छा लगा.

- सुलभ (यादों का इन्द्रजाल..)

Vidhu August 30, 2009 at 10:15 PM  

अन्दर ही अन्दर काँपता हूँ
हवा से पत्तियाँ जैसे
लहरें...unhe padhti rahi hoon ..badhai ..nimn panktiyan khoobsurat ban padi hai

विनय ‘नज़र’ August 31, 2009 at 12:35 PM  

विजेन्द्र जी रचनाएँ सुकून देती हैं
------>
गुलाबी कोंपलें · चाँद, बादल और शाम

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` September 1, 2009 at 8:20 AM  

परिपक्व लेखन .लिए ये ..कवितायेँ सोचने पर मजबूर करती हैं
- लावण्या

प्रदीप कांत September 2, 2009 at 4:39 PM  

मनुष्य जीवन सिर्फ़ दासता के लिये नहीं
प्यार में करुणा ही नहीं, प्रतिरोध भी है
तुम कहो वे बातें
जिससे औरों को भी
मुक्त होने का साहस मिले।

-- सोचने पर मजबूर करती कवितायेँ पढ़कर अच्छा लगा.

PRAN SHARMA September 3, 2009 at 5:27 PM  

VIJENDRA JAESE MAHATTVPOORN KAVI
KEE KAVITAYEN PADHKAR BADAA SUKHAD
LAGAA HAI.

google biz kit September 18, 2009 at 8:50 AM  

hey very good bhut accha likha ha tumne

googlebizkit September 18, 2009 at 8:51 AM  

hey very good you are good writer

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