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  जिन्ना और ता ता धिन्ना (व्यंग्यालेख )- पवन चंदन

Saturday, August 29, 2009

  • [ परिचय:पवन चंदन] जन्म- 17 दिसंबर 1953 में तत्कालीन जिला मेरठ और अब बागपत के गाँव मीतली में वर्ष 1974 में लेखन की शुरुआत। सन 1977 की जनता पार्टी की खिचड़ी सरकार पर दैनिक नवभारत टाइम्स में प्रकाशित कटाक्ष से प्रकाशन का जो क्रम आरंभ हुआ वो आज तक निरंतर जारी है। रचनाएँ राष्ट्रीय सहारा बालवाणी नई दुनिया अमर उजाला दैनिक ट्रिब्यून इत्यादि में खूब छपती रही हैं। कलमवाला फ़िल्म फैशन संसार पत्रिकाओं के संपादकीय विभाग से जुड़े रहे। 'तेताला' और नवें दशक के प्रगतिशील कवि काव्य संग्रह के एक प्रमुख हस्ताक्षर। संप्रति राष्ट्रभाषा नव-साहित्यकार परिषद के संस्थापक व महासचिव और भारतीय रेल सेवा से संबद्ध।भारतीय रेल सेवा में सेवारत। सेवा नगर रेलवे कालोनी में सहन। लिखने पढ़ने में बेहद रूचि।

    संपर्क-P. K . Sharma
    1/12 railway colony sewanagar new delhi 110003
    pawanchandan@gmail.com
    http://chokhat.blogspot.com/
    Mobile 09990005904


    जिन्ना और ता ता धिन्ना

    आज मेरा दोस्त अविनाश कुछ अलग अंदाज में था। वैसे तो वह मुझसे छोटा है पर बात कुछ इस तरह कर रहा था जैसे बड़ा हो गया हो। आते ही बोला...क्या कविता... क्या व्यंग्य, मेरी मान.. तो ये सब छोड़ दे और अपनी कलम को किताब की तरफ मोड़ दे। किताब लिख, किताब... कविता से क्या मिलेगा जो किताब से मिलने वाला है। बस ऐसा मसाला ठूंस दे कि तूफान खड़ा हो जाए। मेरी माने तो शांत तालाब में सोडियम का टुकड़ा फैंक दे। पानी में आग लगाने का रासायनिक तरीका है। आग लगाओ और दूर खड़े सेको। मजे से तमाशा देखो। तुम्हारे लेख और कविता की कीमत भी तीन अंको से चार में पहुंच जाएगी।
    मेरे प्रश्‍न करने से पहले ही बोल पड़ा...तुम भी तो बीसवीं सदी में पैदा हुए थे, सो अपने जनम के आस-पास का कोई किस्सा टटोल और लिख दे गोल मोल। बस एक बात का ध्यान रखियो... अगर किस्सा सच हो तो ऐसे लिखना कि झूठ लगे। यदि सच न मिले तो ऐसा झूठ लिखमार कि सरासर सच लगने लगे। लेखन का सबसे बड़ा टोटका है। कोई चूमे न चूमे, पर सफलता तेरे कदम चूमेगी। किसी की ताब नहीं कि उस किताब को बिकने से रोक सके। सफेद तो क्या काले में भी बिकेगी।
    आइडिया दूं... किसी भले आदमी पर कीचड़ उछाल दे, किसी सज्जन पर लांछन लगा दे। कलम की आजादी इसी को तो कहते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। इसी का सहारा ले और भारत की सुप्त जनता को जगा दे। एक नया मुद्दा दे दे। कुछ दिन गाल बजा लेगी और दाल का दाम भूल जाएगी। ऐसा करने से तेरी भी दाल गल जाएगी। अब ये मत लिखना कि भारत को किसने तोड़ा था, ये आइडिया तो किसी नेता ने मार लिया है।
    मैं सोच ही रहा था कि ये गड़े मुर्दे कौन उखाड़ रहा है? अविनाश ने भांप लिया और बोला... मेरे यार ये मुर्दे, गाड़े ही इसलिए जाते हैं कि उनको उखाड़ा जा सके। ये वो राजनीतिक दांव है जिससे दूसरे को पछाड़ा जा सके। अविनाश अभी भी बोले ही जा रहा था और मैं ये सोचने में मग्न था कि देश में ऐसे नेता क्यों नहीं हैं जो उस किताब को लिखें, जिसमें देश को एक सूत्र में पिरोने का मजबूत धागा विकसित हो। देश का अंग-अंग एक मोती की माला में गुंथा नजर आए। इधर-उधर बिखरे हुए छोटे-छोटे मोती भी इसमें जुड़ने को लालायित हों।
    अविनाश ने जैसे मेरे विचारों को पढ़ लिया हो। बोला,,, बेकार की मत सोच...ऐसी किताब की कल्पना न कर जो एक के साथ चार फ्री मिलें।
    जो विवादित न हो, वो किताब ही क्या ?

    पोस्टकर्ता-
    -सुशील कुमार।
Chandan

5 comments:

Suman August 29, 2009 at 10:24 AM  

nice

संगीता पुरी August 29, 2009 at 10:51 AM  

सही है .. पर एक पुस्‍तक तो लिखी ही जानी चाहिए .. जिससे देश को एकता के सूत्र में बांधा जा सके !!

सुशील कुमार August 29, 2009 at 8:48 PM  

ऐसी ही किताब की जरुरत है।आप लिखें,मैं छपवाने की गारंटी लेता हूँ। बस कुछ पैसे लगेंगे और किताब की फ्री-सेल कुछ दिनों तक करनी होगी।बाकी मैं संभाल लूंगा।

HARI SHARMA August 30, 2009 at 12:44 PM  
This comment has been removed by the author.
HARI SHARMA August 30, 2009 at 12:45 PM  

किताब तो सन्गीता जी लिख देन्गी बढिया और छ्पवा भी आप दोगे सुशील जी.
प्रचार की जिम्मेदारी के लिये पेनल बनना पडेगा.
कुछ नाम मे़ दे रहा हू.

१. समीर लाल जी
२. अविनाश वाचस्पति भाई
३. विजय सत्पति जी
४. सभी ब्लोगर
आगे भी कोइ भी अपना नाम जोड सकता है.

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