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  सच का सामना (हास्य-व्यंग्य) - अविनाश वाचस्पति

Saturday, August 22, 2009


  • अविनाश वाचस्पति :
    दिल्ली विश्वविद्यालय से कला स्नातक। भारतीय जन संचार संस्थान से 'संचार परिचय', तथा हिंदी पत्रकारिता पाठ्यक्रम पत्रकारिता। व्यंग्य, कविता एवं फ़िल्म लेखन प्रमुख उपलब्धियाँ सैंकड़ों पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित जिनमें नई दिल्ली से प्रकाशित दैनिक नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान, राष्ट्रीय सहारा, जनसत्ता इत्‍यादि। वर्ष 2008 में यमुनानगर, हरियाणा में आयोजित प्रथम हरियाणा अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह में फिल्‍मोत्‍सव समाचार के तकनीकी संपादक। हरियाणवी फ़ीचर फ़िल्मों 'गुलाबो', 'छोटी साली' और 'ज़र, जोरू और ज़मीन' में प्रचार और जन-संपर्क तथा नेत्रदान पर बनी हिंदी टेली फ़िल्म 'ज्योति संकल्प' में सहायक निर्देशक। राष्ट्रभाषा नव-साहित्यकार परिषद और हरियाणवी फ़िल्म विकास परिषद के संस्थापकों में से एक। सामयिक साहित्यकार संगठन, दिल्ली तथा साहित्य कला भारती, दिल्ली में उपाध्यक्ष। केंद्रीय सचिवालय हिंदी परिषद के आजीवन सदस्‍य। 'साहित्यालंकार' , 'साहित्य दीप' उपाधियों और राष्ट्रीय हिंदी सेवी सहस्त्राब्दी सम्मान' से सम्मानित। 'शहर में हैं सभी अंधे' स्‍वरचित काव्‍य रचनाओं का संकलन हिन्‍दी अकादमी, दिल्‍ली के सौजन्‍य से प्रकाशन। काव्य संकलन 'तेताला' तथा 'नवें दशक के प्रगतिशील कवि कविता संकलन का संपादन। संप्रति- फ़िल्म समारोह निदेशालय, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, नई दिल्ली में कार्यरत।

    हास्य-व्यंग्य-

    सच का सामना

    ‘सच का सामना’ में
    पप्‍पू की पत्‍नी कर रही है खुलासा
    खोने, खो देने के विवरण पर
    बतला रही है सच।

    पक्‍का सच
    उससे पूछा गया
    पप्‍पू जब डांटता था
    तो गुस्‍से को अब
    तक कैसे करती रही हो मैनेज ।

    सच का सामना
    के एक धांसू सवाल पर
    बतलाया उसने
    मैं टॉयलेट साफ करती थी गुस्‍सा आने पर
    सारा श्रम मेरा झलक आता था उसकी सफाई में
    पूछा एंकर ने
    पर गुस्‍सा इससे कैसे होता था ठंडा
    बोली वो सीधा है फंडा
    जिस ब्रुश से करती थी साफ
    वो टूथ ब्रुश होता था
  • पप्‍पू पतिदेव का।

    एंकर ने मशीन में
    जब डाला प्रश्‍न
    तो मशीन रही चुप
    यानी मौन स्‍वीकृति लक्षणम्।

15 comments:

Anshu Bharti August 22, 2009 at 10:49 AM  

देखियेगा, आप के घर आप का ब्रश सही सलामत है ना अविनाश जी?

विनोद कुमार पांडेय August 22, 2009 at 1:31 PM  

फिर तो पप्पू रोज सुबह एक नयी ब्रश लाता होगा..क्योंकि झगड़े तो रोज ही होते होंगे..आख़िर पप्पू तो पप्पू ही है..ना वो चुप रह सकता है ना पप्पू की पत्नी...

मजेदार..रहा सच का सामना..कभी सच का सामना मे पप्पू को भी पेश कीजिए ना..

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) August 22, 2009 at 1:47 PM  

हहह क्या बात है सर जी कुछ कहना चाहता हूँ पर चुप हूँ क्यों की मौन स्वीक्रत लक्षणम

Dinanath August 22, 2009 at 1:59 PM  

मैंने भाई एक दर्जन ब्रश लाकर रख दिये हैं ताकि सप्ताह तक इसका झमेला मोल न लेना पड़े।

नीरज गोस्वामी August 22, 2009 at 4:19 PM  

बहुत खूब...क्या बात कही है आपने...हर पत्नी को अपना गुस्सा ठंडा करने का एक और गुर सिखा दिया आपने...वाह.
नीरज

Udan Tashtari August 22, 2009 at 4:26 PM  

हा हा!! मौन स्वीक्रत लक्षणम-पप्पू बेचारा!!

Shefali Pande August 22, 2009 at 6:32 PM  

वाह क्या आईडिया है ...बदला लो तो ऐसे ...

कैटरीना August 22, 2009 at 6:43 PM  

Bahut khoob.
वैज्ञानिक दृ‍ष्टिकोण अपनाएं, राष्ट्र को उन्नति पथ पर ले जाएं।

सुशील कुमार August 22, 2009 at 7:10 PM  

मैं तो अपना टूथब्रश छिपाकर ही रखूंगा। वैसे पप्पु अगर अपनी पत्नी को गुस्सा न दिलाये तो उसे ऐसी नौबत न आयेगी कि ब्रश पर कोई आफ़त आये।

राजीव तनेजा August 22, 2009 at 11:36 PM  

लगता है कि अब ब्रश का इस्तेमाल करना बन्द करना पड़ेगा

Anonymous August 23, 2009 at 1:41 AM  

Is se do-teen baaton par to safaai mil jaati hai:
(1) hamara toilet pappu ke toilt se zyada saaf kyon nahin hai?
(2) Jo log hum par ye ilzaam lagaate hain ki hum apne pati dev se itna jhagda kyon karte hain, ve shayad samajh jayenge ki unki patniyan un se jhagda kyon nahin kartn
(3) Jo pati yeh samajh chuke hain aaj kal ve apne ghar ke toilets svayam saaf kiya karte hain...Patniyo, saavdhaan...kahin aap bhi to vo khush patni nahin hain jo pati ki is madad se khush hainn?

कमल शर्मा August 23, 2009 at 12:34 PM  

पप्‍पू की ब‍ीबी ने एक करोड़ रुपए जीते हैं सच का सामना में। पहली प्रतियोगी है जिसने एक करोड़ की रकम जीती। उसने तो एंकर तक की निजी जिंदगी का भांडा फोड़ा जिन पर वह पप्‍पू की बीबी से सवाल कर रहा था, वे सब एंकर पर ही ला्गू होते थे।

BrijmohanShrivastava August 23, 2009 at 9:42 PM  

सच का सामना पर अच्चा व्यंग्य ,हास्य भी ये सच का सामना न जाने कितने परिवारों का विघटन करा कर दम लेगा |आजकल आता है या नहीं बहुत दिनों से टीवी से वंचित हूँ

नन्हीं लेखिका - Rashmi Swaroop August 25, 2009 at 6:05 PM  

eew... somewhat dirty... but nice joke !
kya sir ! mast fazihat kari show ki. aur waah, pappu to pappu, pappu se so kadam aage pappu ki patni!
:))

Pradip Rajput December 23, 2013 at 11:47 AM  

good hame bhi kabhi moka do kuch kahne ka

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