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  आचार्य संजीव 'सलिल' की गीतिकाएँ

Tuesday, August 25, 2009

  • आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' नें नागरिक अभियंत्रण में त्रिवर्षीय डिप्लोमा. बी.ई.., एम. आई.ई., अर्थशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र में एम. ऐ.., एल-एल. बी., विशारद,, पत्रकारिता में डिप्लोमा, कंप्युटर ऍप्लिकेशन में डिप्लोमा किया है। आपकी प्रथम प्रकाशित कृति 'कलम के देव' भक्ति गीत संग्रह है। 'लोकतंत्र का मकबरा' तथा 'मीत मेरे' आपकी छंद मुक्त कविताओं के संग्रह हैं। आपकी चौथी प्रकाशित कृति है 'भूकंप के साथ जीना सीखें'। आपनें निर्माण के नूपुर, नींव के पत्थर, राम नम सुखदाई, तिनका-तिनका नीड़, सौरभ:, यदा-कदा, द्वार खड़े इतिहास के, काव्य मन्दाकिनी २००८ आदि पुस्तकों के साथ साथ अनेक पत्रिकाओं व स्मारिकाओं का भी संपादन किया है। आपको देश-विदेश में १२ राज्यों की ५० सस्थाओं ने ७० सम्मानों से सम्मानित किया जिनमें प्रमुख हैं : आचार्य, २०वीन शताब्दी रत्न, सरस्वती रत्न, संपादक रत्न, विज्ञानं रत्न, शारदा सुत, श्रेष्ठ गीतकार, भाषा भूषण, चित्रांश गौरव, साहित्य गौरव, साहित्य वारिधि, साहित्य शिरोमणि, काव्य श्री, मानसरोवर साहित्य सम्मान, पाथेय सम्मान, वृक्ष मित्र सम्मान, आदि। वर्तमान में आप अनुविभागीय अधिकारी मध्य प्रदेश लोक निर्माण विभाग के रूप में कार्यरत हैं

    गीतिकाएँ

    एक-

    मिल उलूक गीत गा रहे.
    शत्रुओं को मीत पा रहे.

    तंत्र लोक को कुचल रहा.
    देश को मिल-बेच खा रहे.

    मन का मैल छुटाते नहीं,
    बदन को मल-मल नहा रहे.

    यशोदा को छल रहे किशन,
    राधिका को हँस रिझा रहे.

    लाज-शर्म शेष ही नहीं.
    उसूलों को बेच-खा रहे.

    गोद में पाला-बड़ा किया.
    आग में वो ही जला रहे.

    काबलियत को न पूछते,
    जाति-धर्म-भेद छा रहे.

    दशानन से हाथ मिलाकर.
    राम अवध को ढहा रहे.

    शहीदों की बेबसी 'सलिल'
    स्वर्ग में आँसू बहा रहे.
    * * * * *
    दो-

    बुन्देली गीतिका -

    मात नरमदा कित्ता पानी.
    तोर गोद मा किता पानी.

    कल-कल लहरें नाच-कूदकर
    याद दिलाउत हमखों नानी.

    बरखा मां तुम उफ्नाउत तो
    डर जाउत हैं सगरे प्रानी.

    दादुर ढोल बजाउत टर-टर
    खांय कुलाटी मछली रानी.

    भरीं लबालब लगें सुहागन
    गरमी मां बिरहन दुबरानी.

    धुँआधार मां लगा कुलाचें,
    दौडे बन हिरन मस्तानी.

    अमरित जल है जीवन दाता.
    हरी-भरी फसलें मुस्कानी.

    भारी बाँध बंधो बरगी मां
    थमी नहीं तनकउ महरानी.

    कंकर-कंकर से संकर रच
    सार्थक कर दई रे जिनगानी.

    घाट, बाट, मन्दिर नौकाएँ
    छटा 'सलिल' खों खूबई भानी.

    * * * * *

    तीन-

    असंभव संभावनाओं का समय है
    हो रहे बदलाव या आयी प्रलय है?

    आचरण के अश्व पर वल्गा नियम की
    कसी हो तो आदमी होता अभय है

    लोकतंत्री वादियों में लोभतंत्री
    उठ रहे तूफान जहरीली मलय है

    प्रार्थना हो, वंदना हो, अर्चना हो
    साधना में कामना का क्यों विलय है?

    आम जन की अपेक्षाओं, दर्द॑ दुख से
    दूर है संसद यही तो पराजय है

    फसल सपनों की उगाओ "सलिल" मिलकर
    गतागत का आज करना समन्वय है

    * * * * *

    संपर्क : आचार्य संजीव 'सलिल'
    २०४ विजय अपार्टमेन्ट, नेपिअर टाऊन, जबलपुर ४८२००१
    वार्ता : ०७६१ २४१११३१, ०९४२५१ ८३२४४ ई मेल: salil.sanjiv@gmail.com
    ब्लॉग : sanjivsalil.blogspot.com

    पोस्टकर्ता :


    - [सुशील कुमार]

5 comments:

AlbelaKhatri.com August 26, 2009 at 7:31 AM  

अहहहहः......
धन्य कर दिया.............
तीनों गीतिकाएं एक से बढ़ कर एक............
वाह !
आनन्द आगया........
प्रणाम !

सुशील कुमार August 26, 2009 at 2:38 PM  

achchhi kavitayen

manvantar August 28, 2009 at 10:04 PM  

सरल शब्दों में मन को छूती तीनों गीतिकाएँ रुचीं.

Pro. Archana Shrivastav, Raipur August 28, 2009 at 10:17 PM  

सलिल जी की रचनाओं को पढना ही नहीं गुनना भी होता है. उनका बात कहने का अंदाज़ औरों से जरा अलग ही है. तीन-तीन गीतिकाएँ एक साथ पढ़वाने हेतु साधुवाद.

Suman August 29, 2009 at 10:26 AM  

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