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  प्राण शर्मा की गजलें

Sunday, August 9, 2009

परिचय - [प्राण शर्मा]

जन्म स्थान: वजीराबाद (पाकिस्तान)जन्म: १३ जून १९३७
निवास स्थान: कवेंट्री, यू.के.शिक्षा: प्राथमिक शिक्षा दिल्ली में हुई, पंजाब विश्वविद्यालय से एम. ए., बी.एड.कार्यक्षेत्र : छोटी आयु से ही लेखन कार्य आरम्भ कर दिया था. मुंबई में फिल्मी दुनिया का भी तजुर्बा कर चुके हैं. १९५५ से उच्चकोटि की ग़ज़ल और कवितायेँ लिखते रहे हैं.प्राण शर्मा जी १९६५ से यू.के. में प्रवास कर रहे हैं। वे यू.के. के लोकप्रिय शायर और लेखक है। यू.के. से निकलने वाली हिन्दी की एकमात्र पत्रिका ‘पुरवाई’ में गज़ल के विषय में आपने महत्वपूर्ण लेख लिखे हैं। आप ‘पुरवाई’ के ‘खेल निराले हैं दुनिया में’ स्थाई-स्तम्भ के लेखक हैं. आपने देश-विदेश के पनपे नए शायरों को कलम मांजने की कला सिखाई है। आपकी रचनाएँ युवा अवस्था से ही पंजाब के दैनिक पत्र, ‘वीर अर्जुन’ एवं ‘हिन्दी मिलाप’, ज्ञानपीठ की पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय’ जैसी अनेक उच्चकोटि की पत्रिकाओं और अंतरजाल के विभिन्न वेब्स में प्रकाशित होती रही हैं। वे देश-विदेश के कवि सम्मेलनों, मुशायरों तथा आकाशवाणी कार्यक्रमों में भी भाग ले चुके हैं।
प्रकाशित रचनाएँ:
ग़ज़ल कहता हूँ , सुराही (मुक्तक-संग्रह).‘अभिव्यक्ति’ में प्रकाशित ‘उर्दू ग़ज़ल बनाम हिंदी ग़ज़ल’ और साहित्य शिल्पी पर ‘ग़ज़ल: शिल्प और संरचना’ के १० लेख हिंदी और उर्दू ग़ज़ल लिखने वालों के लिए नायाब हीरे हैं.
सम्मान और पुरस्कार: १९६१ में भाषा विभाग, पटियाला द्वारा आयोजित टैगोर निबंध प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार. १९८२ में कादम्बिनी द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय कहानी प्रतियोगिता में सांत्वना पुरस्कार. १९८६ में ईस्ट मिडलैंड आर्ट्स, लेस्टर द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार.२००६ में हिन्दी समिति, लन्दन द्वारा सम्मानित.


गजल - (एक)

सोच की भट्टी में सौ-सौ बार दहता है
तब कहीं जाकर कोई इक शेर कहता है
हर किसी में होता है नफ़रत का पागलपन
कौन है जो इस बला से दूर रहता है
बात का तेरी करे विश्वास क्यों कोई
तू कभी कुछ और, कभी कुछ और कहता है
टूट जाता है किसी बच्चे का दिल अक्सर
ताश के पत्तों का घर जिस पल भी ढहता है
दुनिया में रहना है तो मिल-जुल के सबसे रह
क्यों भला हर एक से तू दूर रहता है
क्या सहेगा पत्थरों की चोट कोई गुल
पत्थरों की चोट तो पत्थर ही सहता है
धूप से तपते हुए ऐ प्राण मौसम में
सूख जाता है समंदर कौन कहता है।
* * *

गजल (दो)

फीकी-फीकी ही लगती है आग के आगे तन-मन की
आग समंदर की हो या हो आग किसी बीहड़ वन की
आग लगे तो इसकी कीमत राख से ज्यादा क्या होगी
पीपल की लकड़ी हो चाहे या हो लकड़ी चन्दन की
झूम रहे हैं सभी परिंदे मस्त हवाओं में खुलकर कर
लगता है मन से बरसेगी आज बदरिया सावन की
संत-सरीखा कोई साथी मिल जाए तो बात बने
नस-नस को महका देती है इक लकड़ी ही चन्दन की
आज हमारे भाग्य जगे हैं प्रीतम सपनों में आये
क्यों न भला मुस्काये मन में कोई कली अभिनन्दन की ।
* * * *

21 comments:

Udan Tashtari August 9, 2009 at 6:16 AM  

प्राण जी की गज़ल के तो हम हरदम दीवाने हैं. बहुत गजब लिखते हैं और आज भी आनन्द आ गया. आपका आभार प्राण जी की गज़लें पढ़वाने का!!

AlbelaKhatri.com August 9, 2009 at 9:29 AM  

kya kahne !
waah
waah
shri pran sharmaaji ki ghazalen utnee hi gahree aur bheetar se bharee hui hain jitni ki samandar ki tah............
waah........nihaal kar diya
sabhi she'r laajwaab lekin ye she'r toh seedha kaleje me utar gaya-

badhaai !
bahut badhaai pranji !

सुभाष नीरव August 9, 2009 at 9:38 AM  

बहुत बेहतरीन ग़ज़लें हैं प्राण जी की। ये शे’र तो दिल में उतर गए-
"सोच की भट्टी में सौ-सौ बार दहता है
तब कहीं जाकर कोई इक शेर कहता है "
0
"आग लगे तो इसकी कीमत राख से ज्यादा क्या होगी
पीपल की लकड़ी हो चाहे या हो लकड़ी चन्दन की"

बहुत बहुत बधाई !
सुभाष नीरव

अविनाश वाचस्पति August 9, 2009 at 9:50 AM  

प्राण जी के हर शेर में
एक जीवंत प्राण रहता है

सुशील जी खूब प्रशंसनीय कार्य कर रहे हैं।

Nirmla Kapila August 9, 2009 at 11:24 AM  

क्या सहेगा पत्थरों की चोट कोई गुल
पत्थरों की चोट तो पत्थर ही सहता है
सोच की भट्टी में सौ-सौ बार दहता है
तब कहीं जाकर कोई इक शेर कहता है "

आग लगे तो इसकी कीमत राख से ज्यादा क्या होगी
पीपल की लकड़ी हो चाहे या हो लकड़ी चन्दन की"
प्राण जी की गज़ल के बारे मे कुछ कहूँ हर बार निश्ब्द होती हूँ सूरज को कैसे द्देप दिखाऊँ दोनो गज़लें दिल मे उतर गयीं लाजवाब नमन है उनकी कलम को बधाई

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' August 9, 2009 at 12:18 PM  

मन को स्पर्श करती रचनाओं के लिए प्राण शर्मा जी साधुवाद के पात्र हैं.

सुशील कुमार August 9, 2009 at 6:11 PM  

प्राण शर्मा अपनी गजलों में परदेस में रहते हुए भी भारतीय चित्त और परम्परा को इस कदर ढालतें हैं कि वह हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि बन जाती है। यह एक बड़ी बात है। हालाकि मैं गजल की कला से पूर्णत:अनभिज्ञ हूँ पर जब मैं इनकी इस विधा के भाव-पक्ष पर जाता हूँ तो यह सहज ही विश्वास हो जाता है कि गजल में इनके द्वारा किया गया प्रयोग गजल को वायवीय और कल्पना की दुनिया से अलगा कर सृजन का एक ठोस धरातल और आधार प्रदान करता है जहाँ नव्यता और भव्यता से युक्त होकर, समय की तह में बसे यथार्थ का सोपान कर, सृजन अनूठे भावलोक में पाठक को ले जाकर उसे तल्लीन और विभोर कर देता है। अगर गौर किया जाय तो इस तरह की भावभूमि पर गजल रचने वाले आज बिरला ही है जो रचना की बानगी प्रस्तुत करने में इतने सफल हुए हैं। इस अन्यतम रचना के लिये प्राण जी को हमारा बहुत-बहुत बधाई!

महावीर August 9, 2009 at 11:12 PM  

धीरे-धीरे साहित्यिक भाषा रूढ़ग्रस्त होकर नवीन साहित्यिक प्रवृतियों के विकास में पूर्ण योग देने योग्य नहीं रह जाती, तब उससे आगे बढ़ी हुई भाषा बोलचाल की भाषा ग्रहण कर लेती है और वह साहित्यिक प्रवृत्तियों के विकास में सहायक होती है. शर्मा जी की रचनाओं में इस गुण से उनकी ग़ज़लों के भावों को आत्मसात करने में कठिनाई नहीं होती और रसास्वादन में आनंद आने लगता है. दोनों ग़ज़लों के सुन्दर भावों, उपयुक्त शब्द-चयन और सही बहरों का निभाव - सभी देखने वाले हैं.
'सोच की भट्टी' का प्रयोग बहुत ही सुन्दर और अद्भुत है. दोनों ग़ज़लों में मतलों ने ही दिल लुभा लिया.
फीकी-फीकी ही लगती है आग के आगे तन-मन की
आग समंदर की हो या हो आग किसी बीहड़ वन की
बहुत सुन्दर. दोनों ग़ज़लें उच्च कोटि की हैं. प्राण जी अनेकानेक बधाईयों के पात्र हैं.

महावीर August 9, 2009 at 11:18 PM  

सुशील जी
आपका नया वेब बहुत सुन्दर है. बधाई.
प्राण जी की सुन्दर ग़ज़लें पढ़वाने के लिए आभार.
शुभकामनाओं सहित
महावीर शर्मा

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` August 9, 2009 at 11:45 PM  

क्या सहेगा पत्थरों की चोट कोई गुल
पत्थरों की चोट तो पत्थर ही सहता है

आदरणीय प्राण भाई साहब
जब् अपनी बात कहते हैं
तब इतनी सरलता से सीधे दिल को छूनेवाली होते हुए...
एक दीर्घ अनुभवी रचनाकार की
सिध्ध - हस्त कला की बुनियाद भी
इसे मुक्कमिल बनाने में लगी है
ये बात,
हम भूल जाते हैं........
क्योंकि ,
लफ्जों की उडान से
भावों की दुनिया में ,
पहुँच जाते हैं
- यही उनकी खूबी है -
जैसा इन पंक्तियों को पढ़ते ,
फूल और पत्थर तक सजीव हो गए हैं
- बधाई आपको
और एक रचनाकार
को दुसरे पारखी रचनाकार ने
अपने जाल घर पर सम्मान से
स्थान दिया
उस बात के लिए
भाई सुशील जी
को भी मुबारक कहना चाहती हूँ -
सादर,
- लावण्या

seema gupta August 10, 2009 at 9:25 AM  

क्या सहेगा पत्थरों की चोट कोई गुल
पत्थरों की चोट तो पत्थर ही सहता है

" प्राण जी गजलो का अपना एक अलग ही अंदाज है......हर एक शेर की अपनी एक शान है.....आपके ब्लॉग पर इन बेहतरीन गजलो को पढ़ने का अवसर मिला आभार"

regards

पंकज सुबीर August 10, 2009 at 10:50 AM  

सबसे पहले तो ये कि प्राण साहब की ग़ज़लें हमेशा ही एक दूसरी दुनिया की सैर करा देती हैं । उनकी ग़ज़लों में जो आम बोलचाल के शब्‍द होते हैं वो सुनने का आनंद और बढ़ा देते हैं । वे ग़ज़ल की विधा के उस्‍ताद हैं और साथ ही बहुत अच्‍छे शायर भी हैं । नहीं तो अक्‍सर ये दोनों गुण एक साथ नहीं मिलते । वे जिस प्रकार बहर का संतुलन कहन के साथ साधते हैं उसे देख कर सांसें उसी प्रकार थम जाती हैं जिस प्रकार किसी कुशल नट को रस्‍सी पर संतुलन साधते देख थमती हैं । प्राण साहब की ग़ज़लों में कहन और बहर का अनूठा संतुलन होता है । मेरा नमन उनको और आग लगे तो इसकी कीमत राख से ज्यादा क्या होगी
पीपल की लकड़ी हो चाहे या हो लकड़ी चन्दन की ये शेर लिखने वाली उनकी लेखनी को ।

नीरज गोस्वामी August 10, 2009 at 11:27 AM  

क्या सहेगा पत्थरों की चोट कोई गुल
पत्थरों की चोट तो पत्थर ही सहता है

धूप से तपते हुए ऐ प्राण मौसम में
सूख जाता है समंदर कौन कहता है।
******
आग लगे तो इसकी कीमत राख से ज्यादा क्या होगी
पीपल की लकड़ी हो चाहे या हो लकड़ी चन्दन की

जिस लेखनी से ऐसे कमाल के शेर निकलते हैं उस लेखनी को और उसे चलाने वाले गुरुदेव प्राण शर्मा जी को नमन करता हूँ . मैं इस लायक नहीं की उनके लिखे पर टिपण्णी कर पाऊं सिर्फ आँखें बंद कर हरदम दुआ करता हूँ की इश्वर उन्हें हमेशा स्वस्थ और खुश रख्खे. भाषा का ऐसा दुर्लभ प्रयोग और कहीं देखने को ही नहीं मिलता...एक एक अशार सीधे सीधे दिल में उतर जाता है और आनंद का सैलाब सा बह निकलता है...वाह...
नीरज

kavi kulwant August 10, 2009 at 11:49 AM  

do aur umda gazalen...
ab to aap ko rubaru sunane ka man karta hai..

Dr. Ahmad Ali Barqi Azmi August 10, 2009 at 3:27 PM  

आधुनिक हिन्दी जगत मेँ प्राण शर्मा है वह नाम
जिसकी कविताओँ का है साहित्य मेँ आला मुक़ाम

उनकी सब रचनाओँ मेँ है फिक्रो फन की ताज़गी
अमनो सुलहो आशती का है ग़जल उनकी पयाम

हैँ कहानीकार भी वह एक बेहद कामयाब
शायरी है उनकी गोया बादह-ए-इशरत का जाम

लिख रहे हैँ वह ग़ज़ल के फन पे बर्क़ी एक किताब
सब का मंज़ूरे नज़र हो है दुआ उनका ये काम

अहमद अली बर्क़ी आज़मी
नई दिल्ली-110025

Dr. Sudha Om Dhingra August 12, 2009 at 11:13 PM  

प्राण भाई साहब की ग़ज़लों का अनूठा अन्दाज़ हमेशा की तरह आज भी मुझे कुछ नया लिखने की प्रेरणा और ऊर्जा दे गया.
बधाई!

ashok andrey August 13, 2009 at 5:54 PM  

priya bhai pran jee aapki dono gazlon ne dil ko kahin gehre chhua hai- "aag lage to isski keemat raakh se jayaada kaya hogii, peepal kii lakdii ho chahe ya lakdii chandan kii" bahut khoob
meri aur se badhai sveekaren

ashok andrey

श्रद्धा जैन August 16, 2009 at 5:27 PM  

सोच की भट्टी में सौ-सौ बार दहता है
तब कहीं जाकर कोई इक शेर कहता है

wah wah

हर किसी में होता है नफ़रत का पागलपन
कौन है जो इस बला से दूर रहता है
wah

बात का तेरी करे विश्वास क्यों कोई
तू कभी कुछ और, कभी कुछ और कहता है
टूट जाता है किसी बच्चे का दिल अक्सर
ताश के पत्तों का घर जिस पल भी ढहता है
दुनिया में रहना है तो मिल-जुल के सबसे रह
क्यों भला हर एक से तू दूर रहता है
क्या सहेगा पत्थरों की चोट कोई गुल
पत्थरों की चोट तो पत्थर ही सहता है
धूप से तपते हुए ऐ प्राण मौसम में
सूख जाता है समंदर कौन कहता है।

wah kamaal ka maqta hai

ye gazal hamesha padhna achha lagta hai

shukriya aapne Guru ji ki gazal padhne ka awsar diya

श्रद्धा जैन August 16, 2009 at 5:29 PM  

फीकी-फीकी ही लगती है आग के आगे तन-मन की
आग समंदर की हो या हो आग किसी बीहड़ वन की
bahut sach

आग लगे तो इसकी कीमत राख से ज्यादा क्या होगी
पीपल की लकड़ी हो चाहे या हो लकड़ी चन्दन की
ahahhhaaaaa kya baat kahi hai

झूम रहे हैं सभी परिंदे मस्त हवाओं में खुलकर कर
लगता है मन से बरसेगी आज बदरिया सावन की
bahut sunder

संत-सरीखा कोई साथी मिल जाए तो बात बने
नस-नस को महका देती है इक लकड़ी ही चन्दन की
khoobsurat sher

आज हमारे भाग्य जगे हैं प्रीतम सपनों में आये
क्यों न भला मुस्काये मन में कोई कली अभिनन्दन की ।

ahahaahahahaaaaaaaaaaaaa Guru ji maqta bahut meetha hua hai

अविनाश वाचस्पति August 16, 2009 at 8:40 PM  

प्राण शर्मा जी की गजल का हर शेर
सामने वाले को लुभा लेता है
उसे डराता नहीं
अपना बना लेता है।

प्रदीप कांत September 19, 2009 at 10:31 PM  

क्या सहेगा पत्थरों की चोट कोई गुल
पत्थरों की चोट तो पत्थर ही सहता है

VAH

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