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  सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कवितायें -

Friday, August 7, 2009


  • "जंगल का दर्द" काव्य-संग्रह में कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की अपने अंतर्जगत और बाह्य जगत के जानवरों से लड़ाई, समसामयिक हिन्दी कविता की उपलब्धि है। काव्य-संग्रह "कुआनो नदी" की कवितायें डूबते सूरज की लम्बी परछाईयाँ थीं, अब "जंगल का दर्द" में अन्धकार सिमटकर बुलेट-सा छोटा, ठोस और भारी हो गया है। काव्य-विन्यास में इस परिवर्तन को
    कवि की यातना और दृष्टि से जोड़कर समझा जा सकता है। प्रस्तुत है काव्य संग्रह "जंगल का दर्द" से उनकी चुनी हुई दो कविताएँ -


    धूल - ( एक )

    तुम धूल हो -
    पैरों से रौंदी हुई धूल ।
    बेचैन हवा के साथ उठो ,
    आँधी बन
    उनकी आँखों में पड़ो
    जिनके पैरों के नीचे हो ।

    ऐसी कोई जगह नहीं
    जहाँ तुम पहुच न सको
    ऐसा कोई नहीं
    जो तुम्हे रोक ले ।
    तुम धूल हो -
    पैरों से रौंदी हुई धूल
    धूल से मिल जाओ ।

    धूल ( दो )

    तुम धूल हो
    ज़िंदगी की सीलन से
    दीमक बनो

    रातों-रात
    सदियों से बंद
    दीवारों की
    खिड़कियाँ
    दरवाजे
    और रोशनदान चाल दो ।

    तुम धूल हो
    ज़िंदगी की सीलन से जनम लो
    दीमक बनो, आगे बढो़।

    एक बार रास्ता पहचान लेने पर
    तुम्हें कोई खत्म नहीं कर सकता ।
    * * * * *


7 comments:

रवि कुमार, रावतभाटा August 8, 2009 at 1:15 AM  

बेहतरीन कविताएं...
शुक्रिया....

Udan Tashtari August 8, 2009 at 5:57 AM  

आभार इन उम्दा रचनाओं को पढ़वाने का.

अविनाश वाचस्पति August 8, 2009 at 9:53 AM  
This comment has been removed by the author.
अविनाश वाचस्पति August 8, 2009 at 9:53 AM  

धूल कविताएं इतनी अच्‍छी लगी हैं कि मेरा मन कहता है कि हमारे सारे ब्‍लॉग धूल हो जाएं, रचनाएं सभी धूल हो जाएं, टिप्‍पणियां सभी धूल हो जाएं और हासिल होगा हमारे विचार शूल बन पाएंगे।

सुशील कुमार August 8, 2009 at 10:09 AM  

वाह वाह अविनाश भाई,क्या खूब कही!

परमजीत बाली August 8, 2009 at 2:08 PM  

बहुत बढिया कविताएं हैं। आभार।

Vasudha August 8, 2009 at 11:35 PM  

bahut dino baad kachot gayi Sarweshwar Dayal ji ki kavitayein, meri priya kavitayein.

college ke dino mein unhoney mera bahut utsah badhaya tha, ek kahani pratiyogita ke dauran dwitiye puruskar ke roop mein apni do kitabain bhaint karke.

apka bahut bahut dhanyavad,

Divya Mathur

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