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  अजेय की कविताएँ: हिमालय की तराईयों से उठता दर्द का गुबार

Sunday, August 16, 2009

परिचय: अजेय -
अजेय हिम के अंचल हिमाचल से हिंन्दी के चर्चित युवा कवि हैं जिनकी कविताओं में वहाँ के लोक की आवाज़ है, पत्थरों में गुम हो गयी ज़िन्दगी की कराह है और तथाकथित आधुनिकता ने विकास के नाम पर जिस तरह उनके पहाड़, जंगल और नदियों में जो त्रासदियाँ रच दी हैं, उसके अकथ दु:ख की अप्रतिम और मार्मिक गाथा है।
आपका जन्म 1965 में गाँव सोमनम, लाहौल- स्पिति (हिमाचल प्रदेश) में हुआ। संप्रति - हिमाचल प्रदेश के केलंग में उद्योग विभाग में कार्यरत हैं। 1985 से कविताएँ लिख रहे हैं। जिन संपादकों ने आपकी कविताओं पर विशेष रूप से नोटिस लिया हैं उनमें प्रमुख हैं- ज्ञानरंजन ('पहल' के संपादक) , विजेन्द्र ('कृति ओर' के संपादक) , और रति सक्सेना ('कृत्या' की संपादिका)। आपकी कविताओं को घोर उपेक्षा और विरोध का सामना करना पड़ा है क्योंकि वह दुखते रगों पर हाथ रखकर बताती है कि घाव यहाँ हैं, हालाकि आपकी कविताएँ अब छप कर पाठकों के समक्ष आ रही हैं। अपनी ही कविताओं के बारे में आपका कथन है कि
" मेरी कविताओं को घोर विरोध का सामना करना पड़ रहा है। कभी- कभी बहुत दुख होता है, फिर तसल्ली होती है कि घोर उपेक्षा के बावजूद उन्हें मेरी कविताएं छापनी पड़ रहीं हैं तो कोइ बात तो ज़रूर होगी! कवि को थोड़ा आत्म-मुग्ध भी होना चाहिए। हिमालय में रहता हूँ, और इस ऊंचाई से देश को देखता, दर्ज करता हूँ। एक पहाड़ी की नज़र से दुनिया को देख्नना और उस पर हंसना मेरा प्रिय शगल है. ...... "बाज़ीचा ए अत्फ़ाल है दुनिया मिरे आगे..."। मैं मानता हूं कि दुनिया बहुरंगी है। हमें चीज़ों को ब्लैक एंड व्हाईट में नहीं देख्नना चाहिए। विचार और विचार-धारा को रचना-प्रक्रिया पर हावी नही होने देना चाहिए। कविता या किसी भी कला-विधा को राजनीति का उपकरण नही बनाना है, बल्कि उसका मार्गदर्शक बनाना है। कवि का विजन किसी भी विचारधारा से ज़्यादा महत्वपूर्ण है। इसी ऊलजलूल सोच के साथ जीना अच्छा लगता है।"


कवितायें-

बयूँस की टहनियाँ
( आदिवासी बहनों के लिए )

हम ब्यूँस की टहनियाँ हैं
दराटों से काट-छांट कर
सुन्दर गट्ठरों में बाँधकर
हम मुंडेरो पर सजा दी गई हैं
खोलकर बिछा दी जाएंगी
बुरे वक्त में
चारे की तरह
हम छिलेंगी
जानवरों के पेट की आग बुझाएंगी।

हम बयूँस की टहनियाँ हैं
छिलकर
सूखकर
हम और भी सुन्दर गट्ठरों में बँध जाएंगी
नए मुंडेरों पर सज जाएंगी
तोड़कर झौंक दी जाएंगी
चूल्हों में
बुरे वक्त में
ईंधन की तरह
हम जलेंगी
आदमी का जिस्म गरमाएंगी।

हम बयूँस की टहनियाँ हैं
रूखे पहाड़ों पर रोप दी गई
छोड़ दी गई हैं मौसम के सुपुर्द
लम्बी सदियों में हमारी त्वचा काली पड़ जाती है
मूर्च्छित, खड़ी रह जाती हैं हम
अर्द्ध निद्रा में
और मौसम खुलते ही
हम पत्थरों से चूस लेती हैं
जल्दी-जल्दी
खनिज और पानी ।

अब क्या बताएं
कैसा लगता है...
सब कुछ झेलते हुए
ज़िन्दा रह जाना इस तरह से
सिर्फ़ इसलिए
कि हम अपने कंधों पर और टहनियाँ ढो सकें
ताज़ी, कोमल, हरी-हरी
कि वे भी काटी जा सकें बड़ी हो कर
खुरदरी होने से पहले
छीलकर सुखाई जा सकें
जलाई जा सकें
या फिर गाड़ दी जा सकें किसी रूखे पहाड़ पर
हमारी ही तरह।

हम बयूँस की टहनियों को
जितना चाहो दबाओ, लचकाओ
झुकती ही जाएंगी लहराती हुई
जब तक हममें लोच है

लेकिन कड़क कर टूट जाएंगी
जिस दिन सूख जाएंगी।


लेम्पपोस्ट के नीचे बैठी औरत


वहाँ जो औरत बैठी थी
उस ने होंठ रंग रखे थे खूब चटख
और नाखून भी ।

उसकी गर्दन पर काली झुरियाँ बन रही थी
और ज़बरन घुँघराले किये बालों से पसीना चुहचहा रहा था ।

वहाँ जो औरत बैठी थी
उसके चारों ओर भिनभिना रहे थे बच्चे
एक दूसरे को छेड़ते, खींचते
धकियाते, गिराते, रूलाते,
मस्त ! माँ से बेखबर ।

वहाँ जो औरत बैठी थी
उसकी आँखों से भाग कर
सितारों में खो गई थी चमक
उसके चेहरे पर लगा था ग्रहण
और चाँद हँस रहा था ।

उसके भीतर के तमाम परिन्दें
कर रहे थे कूच की तैयारी
अपनी भरपूर चहचहाहटों और ऊँची उड़ानों के साथ
भोर होते ही ।

वहाँ जो औरत बैठी रहेगी
उसकी आर्द्रता सोख ले जाएंगे बादल
हवाएं चुरा लेंगीं उसके सुनहरे सपने
और सूरज छीन लेगा उसकी रही सही गरमाईश
दिन निकलते ही ।

यह धरती ही थामे रहे संभवत:
जैसे-तैसे
एक चुक रही औरत का बोझ
दिन भर।

वहाँ जो औरत बैठी है
उसे बहुत देर तक
यों सजधज कर
गुमसुम
चुपचाप बैठे नहीं रहना चाहिए ।


बीस साल बाद सरवरी*
[सरवरी*= कुल्लू में विपाशा की सहायक नदी]


सरक रही है सरवरी
कूड़ा, शौच और मच्छियां ढोती
झीर बालक नहा रहे, प्रफुल्ल
बदबूदार भद्दे सूअरों के साथ
घिर गए हैं किनारे दुकानों मकानों और झाबों से
सिमटती जा रही सरवरी ।

बड़ा ही व्यस्त बाज़ार उग आया है
नया बस स्टैंड बन गया है
यहीं कहीं एकान्ताश्रम हुआ करता था
और कहाँ खो गई है प्रार्थना की मधुर घंटियाँ...
जहाँ शरणार्थियों के छोटे-छोटे
खोखे हुआ करते थे
थियेटर के सामने खड्ढ में,
पहाड़-सा शॉपिंग कॉम्पलेक्स खड़ा हो गया है ।
और तिब्बतीयन आंटी की भट्टी थी
(जुमा, मोमो, लुगड़ी............ )
पुल के सिरे वाला पनवाड़ी
लगता है सबलोग कहीं शिफ्ट कर गये हैं।

लकड़ी के जर्जर पुल के दोनों ओर रेड़ियां सज रही हैं ।
सब्जियाँ, मनियारी...
टेम्पो ही टेम्पो
और इन सब से बेखबर
बीस साल पुराना वही बूढ़ा साँड़
दिख जाता है अचानक आज भी
खाँसता, लार टपकाता, जुगाली करता
पुल के बीचों-बीच अधलेटा
उसकी पसलियाँ भी साफ-साफ दिख रही हैं
मानो सचमुच ही हो ।

और एक पक्की सड़क निकल गई है
काई लगी खस्ताहाल थियेटर के ठीक पीछे से नदिया के साथ-साथ
दूर जहाँ विपाशा* में विलीन हो रही है सरवरी
उठ रहा है धुआँ भूतनाथ में
जहाँ पेडों के नीचे इम्तेहान की तैयारियाँ किया करते थे
कुछ अघोरियों के साथ
देर रात तक
बैठे रहते हैं
लावारिस चिताओं की आग तापते
नशेड़ी लड़के ।
[विपाशा*= हिमाचल की नदी]

14 comments:

अविनाश वाचस्पति August 16, 2009 at 7:18 PM  

अजेय की कविताएं
विचारों में नेक
सच्‍चाई में टेक
अनेक में एक।

अशोक सिंह August 16, 2009 at 8:40 PM  

हिमालय के पहाड़ी जन-जीवन की सुन्दर कवितायें लिखी हैअजेय ने। पढवाने के लिये बहुत धन्यवाद।

Dinanath August 16, 2009 at 8:41 PM  

बड़ा मार्मिक चित्रण किया है भाई।

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' August 16, 2009 at 10:03 PM  

यथार्थ की विसंगतियों का हृद्स्पर्शी शब्दांकन आपकी रचनाओं कि विशेषता है. यह बता दूं कि 'विपाशा' नर्मदा के सौ नामों में से एक है.

hem pandey August 16, 2009 at 10:26 PM  

अजेय की इन बेहतरीन कविताओं को पढ़वाने के लिए धन्यवाद.

सुभाष नीरव August 16, 2009 at 10:41 PM  

अजेय की इन कविताओं में भीतर तक छीलने की शक्ति है। बहुत मारक हैं गहरी संवेदना में पगी ये कविताएं…

अर्चना तिवारी August 16, 2009 at 11:11 PM  

अज्ञेय जी की सुंदर कविताएँ...आभार

vijay gaur/विजय गौड़ August 17, 2009 at 7:08 AM  

भौगोलिक विशिष्टता अजेय की कविताओं का सच है।
आभार पढवाने के लिए।

Uday Prakash August 17, 2009 at 9:01 AM  

अंतिम कविता तक आते-आते विनाश, विघटन, क्षरण के दृश्य घने होते जाते हैं। आदिवा्सी लड़कियों से लेकर विपाशा और सर्वरी तक....! एक पुराना नैसर्गिक संसार मिटता जाता है और एक ऐसी सभ्यता पसरती जाती है जहां हर मानवीय और प्राकृतिक जीवन उसी बूढे़ बैल की तरह है, जिसकी पसलियों में समय के आंसू हैं।
सरल-सहज लेकिन बहुत संप्रेषणीय कविताएं!

राजीव तनेजा August 17, 2009 at 9:23 PM  

संवेदनाओं से भरपूर प्रभावी कविताएँ

श्यामल सुमन August 18, 2009 at 8:03 PM  

पहाड़ी जीवन के हकीकत को बयां करती अजेय की कविता बहुत कुछ कह जाती है और बहुत दूर तक जाती है।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

राजेश उत्‍साही August 20, 2009 at 12:58 PM  

बयूंस की टहनियां अंदर तक हिला देने वाली कविता है। कविता पढ़कर पहाड़ की ही नहीं सारी कामकाजी महिलाओं की तस्‍वीर आंखों में कौंध जाती है। अजेय जी अपनी इस भाषा को जिलाए रखें।

अजेय August 21, 2009 at 7:30 AM  

आभार सुशील जी , और आप सब का जिन्हो ने मेरि कविताएं पढ़ी; उन पर टिप्पणी की.
एक नई जानकारी मिली कि विपाशा नर्मदा के सौ नामो मे से एक है. यहां हिमालय मे हम व्यास को ही पौराणिक विपाशा मानते है.यह रोह्तांग से निकलती है , मनाली , कुल्लू, मण्डी, कांगड़ा होते हुए पंजाब पहुंचती है.पाकिस्तान मे जा कर यह सिन्धु मे मिल जाती है. पंजाब की पांच नदियों मे से एक इस नदी के किनारे भारत की आदिम संस्कृतियों और बाहर से आयी सभ्यताओं के हज़ारों वर्ष पुराने अवशेष छिटके हुए मिलते हैं. कुल्लु के लोग तो यहां तक मानते हैं कि सारी की सारी वैदिक संस्कृति इस व्यास( विपाशा) के आस पास ही फूली फली थी.
आप की इस जानकरी से कुछ नये संकेत मिल रहे हैं. जानना चहूंगा , क्या असिक्नी, वितस्ता, इरावती, परुष्णी, श्तुद्रि, चन्द्रभागा, आदि भी नर्मदा के कथित सौ नामो मे आते है?
मह्ज़ जिग्यासा है, अन्यथा न लें.

प्रदीप कांत August 23, 2009 at 12:24 PM  

वहाँ जो औरत बैठी थी
उसकी आँखों से भाग कर
सितारों में खो गई थी चमक
उसके चेहरे पर लगा था ग्रहण
और चाँद हँस रहा था ।

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