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  हरि शर्मा की कविता- जब याद आती हो तुम

Wednesday, July 22, 2009


छवि - हरि शर्मा - जून १९६५ को

करुले जिले के हिंडौन कसबे में जन्मे हरि शर्मा कविता लेखन से जुड़ तो बहुत छोटी वय में गए लेकिन जैसे -जैसे बड़े होते गए ,काव्य सुधा के पाठ और श्रवण के लिए उनका रुझान बढ़ता गया. कालांतर में अपने आपको कवि के बजाय प्रथम श्रेणी कहलवाना पसंद करने लगे. इसका फायदा हुआ की मंच ले लगभग सभी चर्चित कवियों की कविताएं उन्हें इतनी कंठस्थ हो गयी कि आज के एक बहुचर्चित और लोकप्रिय गीतकार को एक गीत सुनाते हुए जब आगे पंक्तियाँ याद नहीं आयी तो इनसे कहा की शर्मा जी ज़रा बताये आगे क्या है? गीतकार को यह विश्वास था की शर्मा जी को जरूर याद होगी. २००५ में गाजियाबाद पोस्टिंग के दिनों में लेखनी को फिर गति मिली. प्रख्यात गीतकार श्री ओम प्रकाश चतुर्वेदी " पराग ", डॉक्टर कुंवर बेचैन जी, श्री कमलेश भट्ट "कमल" जी जैसे गीतकारों की संगत में कुछ गीत लिखे जो पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुए. इसके बाद ब्लॉग लेखन का दौर शुरू हुआ और प्रख्यात साहित्यकार पूर्णिमा वर्मन जी के प्रोत्साहन और मार्गदर्शन से इन दिनों नियमित लेखन जारी है. श्री हरि शर्मा भारतीय स्टेट बैंक में उप प्रवंधक के पद पर कार्य कर रहे हैं


संपर्क- 60 , विद्या पार्क, एयर्फोर्स एरिया,जोधपुर।

मोबाईल: 09001896079, 09828018586


कविता-



जब याद आती हो तुम



जब भी मैं पढ़ने के कमरे में
ले के बैठता हूं किताबें



तो याद आती हो मुझे तुम,
हर बार किताब रह जाती है
खुली की खुली बिना पढ़ी



मेरे मन के किसी कोने से
फिर यही आवाज आती है
इन किताबों में क्या रक्खा है


पढना है तो कोई और किताब पढ़ो
किसी के दिल की किताब पढ़ो
किसी के मन की किताब पढ़ो
किसी की सांसों को पढ़ो
और कुछ भी ना पढ़ सको
तो ये कविता ही पढ़ लो
जो लिखी है बस तुम्हारे लिये



इसे लिखा है आज अभी ही
तुमसे बातें करते हुए.
कैसी रही नई कविता ?


वो ये सब पढ़ती है और
हमको जवाब देती है
कविता तो हमने ली सुन



इसमें से आती प्यार की धुन
कुछ ऐसा भी दिखाओ गुण
तुम वहां कीबोर्ड पर लिखो
मैं यहां पर गाऊं रून-झुन
जवाब जमता है तो ठीक
नहीं तो अपना सिर धुन
मैंने तुझे चुना तू मुझे चुन



हवाए गाने लगी हैं देखो
सुन साहिबा सुन
प्यार की मीठी धुन।


9 comments:

sudhir saxena 'sudhi' July 23, 2009 at 12:56 AM  

इन किताबों में क्या रक्खा है
किसी के मन की किताब पढ़ो
किसी की सांसों को पढ़ो
और कुछ भी ना पढ़ सको
तो ये कविता ही पढ़ लो.

अच्छी कविता है. कवि हरि शर्माजी को बधाई.
उम्मीद है, आगे भी और अच्छी कविताएं
पढ़ने को मिलेंगी.
-सुधीर सक्सेना 'सुधि'
जयपुर

Pran Sharma July 23, 2009 at 1:38 AM  

Hari sharma jee kee kavita " jab
yaad aatee ho tum" padhee hai.
saras bhavabhivyakti hai.meree
badhaaee.

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' July 23, 2009 at 8:54 AM  

हृद्स्पर्शी रचना.

अविनाश वाचस्पति July 23, 2009 at 11:13 AM  

आनंद आ गया इस कविता को पढ़ कर
जैसे लड़ रहा हो कोई झगड़ झगड़ कर
एक अद्भुत अनुभूत सुखद अभिव्‍यक्ति।

Prem Farrukhabadi July 23, 2009 at 11:15 AM  

मेरे मन के किसी कोने से
फिर यही आवाज आती है
इन किताबों में क्या रक्खा है
पढना है तो कोई और किताब पढ़ो
किसी के दिल की किताब पढ़ो
किसी के मन की किताब पढ़ो
किसी की सांसों को पढ़ो
और कुछ भी ना पढ़ सको
तो ये कविता ही पढ़ लो
जो लिखी है बस तुम्हारे लिये

bahut sundar bhavpoorn dil se badhai !!

सुशील कुमार July 23, 2009 at 4:52 PM  

सरल-सुबोध लफ़्जों में लिखी हरि शर्मा की इस कविता का केन्द्रीय भाव ,पर सरल-सहज नहीं है, यहाँ कविता का भाव अत्यंत संश्लिष्ट है जो पाठक को विचारने पर मजबूर करता है।
हरि शर्मा जी अपनी कविता और अपने नवगीत में लय और उसके सांगीतिक संयोजन पर बहुर बल देते हैं जो उनकी कविता को कविता के वर्तमान स्वरूप से अलगाता है और विशिष्ट बनाता है।

"अर्श" July 23, 2009 at 10:47 PM  

WAAH JAB GAZAL PITAMAH SHRI PRAAN SHARMAA JI AUR AACHARYA SAHAB KUD BADHAAYEE DE RAHE HAI TO HAMAARI KYA MAJAAL KE KUCHH KAHEN ... BAHOT HI KHUBSURAT KAVITA LIKHI HAI AAPNE... KHUBSURAT HINDI KE SUNDAR BOL KE SAATH... BAHOT BAHOT BADHAAYEE ...



ARSH

अनुपम अग्रवाल July 23, 2009 at 11:48 PM  

ये हवायें भी अब यूँ गुनगुनाने लगीं

प्यार की धुन मचल के सुनाने लगीं

परमजीत बाली August 1, 2009 at 5:58 PM  

बहुत सुन्दर रचना है बधाई।

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