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  अरविन्द श्रीवास्तव की कवितायें

Sunday, July 19, 2009

छवि: अरविन्द श्रीवास्तव

आप बिहार से हिन्दी के युवा कवि हैं, लेखक हैं। संपादन-रेखांकन और अभिनय -प्रसारण जैसे कई विधाओं में आप अक्सर देखे जाते हैं। जितना आप प्रिंट पत्रिकाओं में छपते हैं, उतनी ही आपकी सक्रियता अंतर्जाल पत्रिकाओं में भी है -

परिचय- अरविन्द श्रीवास्तव

जन्म तिथि : 2 जनवरी 1964

पिता : श्री हरिशंकर श्रीवास्तव `शलभ´

शिक्षा : एम. ए. द्वय (इतिहास और राजनीति विज्ञान) पी .एच. डी. (मधेपुरा जिला का ऐतिहासिक सर्वेक्षण -1887-1947)

प्रकाशित :- 1) साहित्यिक पत्रिकाओं में : वागर्थ, वसुधा, परिकथा, दोआबा, हंस, वर्तमान साहित्य, अक्षर पर्व, जनपथ, उद्भावना, साक्ष्य (बिहार विधान परिषद), साक्षात्कार, देशज, दस्तावेज, उत्तरार्द्ध, सहचर, कारखाना, अभिघा, सारांश, सरोकार, प्रखर, कथाबिंव, योजनगंधा, औरत , आकल्प, शैली, अपना पैग़ाम, संभवा, कला-अभिप्राय, रास्ता, ये पल, मंडल विचार, क्षितिज, आदि ।

2) कृतियाँ: ` कैद हैं स्वर सारे´ एवं `एक और दुनिया के बारे में´

संपादन और संयोजन का भी आपको अनुभव है। कारखाना ( जर्मन साहित्य पर केन्द्रित अंक-27) का संयोजन । ’सिलसिला´ पत्रिका एवं `सुरभि´का संपादन। हिन्दी,उर्दू एवं मैथिली पुस्तक एवं पत्रिकाओं में रेखाकंन- आवरण, क्षे़त्रीय फिल्मों में अभिनय प्रसारण : आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से काव्य / आलेख ।

सम्प्रति - लेखन, अध्यापन, कम्पयूटर एवं सांस्कृतिक कार्य से संबद्धता वेब पत्रिका ‘यह सिलसिला’ - yehsilsila.blogspot.com एवं जनशब्द - janshabd.blogspot.com का संपादन


संपर्क- कला-कुटीर ,अशेष मार्ग, मधेपुरा,
बिहार-852113
मो.-094310 80862



अरविन्द श्रीवास्तव की कवितायें:



वेंटिलेशन


चिड़ियाँ बतिया रही थी
कि हमारे हँसी-खुशी के सुकोमल दिन
खत्म हो चले है

जी घबरा रहा है
इस सदी को देख कर
इस बीच हमारे कई परिजनों ने
धरती से अपना रिश्ता
तोड़ दिया है



हमारे लिए यह धरती
अब नहीं रह गयी निरापद



चिड़िया बतिया रही थी
बगैर किसी तामझाम के
बगैर किसी घोषणा-पत्र के



जीने की इस उम्मीद के साथ
कि बड़ी-बड़ी इमारतों में भी
रखी जाय
कम से कम
एक वेंटिलेशन !


* * *


नृपति उदास है


नृपति उदास है


उसकी बेटी ने
आज कोई कत्ल नहीं किया


रक्त से आचमन
ड्राइंग कक्ष में
चांद.सितारों को कैद नहीं किया


वाद्‌य यंत्रों की धुनाई
मौसमों को
पिंजरे में बंद नहीं किया
विरासती फौजों का
‘आनर‘ नहीं लिया


खलबली है नृपतंत्र में
कल बेटी
कामगारों की बस्ती क्यों गयी


नहीं आ रही
भुने हुए काजू की खुश्बू
आज उसके
गू से !

10 comments:

Anshu Bharti July 20, 2009 at 2:44 PM  

काफ़ी विचारवान कविता है।

रवीन्द्र प्रभात July 20, 2009 at 6:56 PM  

आज के सच को निर्भीकता के साथ बखूबी बयां करती हुयी दोनों कवितायेँ एक संवेदनशील व्यक्ति को झकझोरने के लिए काफी है .....आभार इन दोनों कविताओं के प्रकाशन के लिए ......!

BrijmohanShrivastava July 20, 2009 at 8:41 PM  

प्रिय शलभ -आपके वारे में पूरी जानकारी पढी |प्रसन्नता हुई |देश की स्तर की पत्रिकाओं में आपकी रचनाएँ प्रकाशित होती है |चिडिया की जीने की जो उम्मीद है बेहद अच्छी लगी ऐसे ही आदमी भी जी रहा है किसी रौशनदान के सहारे |नृपति,नृपतंत्र और कामगारों की बस्ती सचोट व्यंग्य |

प्रदीप कांत July 20, 2009 at 10:23 PM  

चिड़िया बतिया रही थी
बगैर किसी तामझाम के
बगैर किसी घोषणा-पत्र के



जीने की इस उम्मीद के साथ
कि बड़ी-बड़ी इमारतों में भी
रखी जाय
कम से कम
एक वेंटिलेशन !

सच को निर्भीकता के साथ बखूबी बयां करती हुयी कवितायेँ

महेन्द्र मिश्र July 20, 2009 at 10:33 PM  

Bahut sundar rachana.

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' July 20, 2009 at 10:51 PM  

मार्मिक रचनाएँ

डा राजीव कुमार July 21, 2009 at 7:22 AM  

समकालीन कवि अरविन्द श्रीवास्तव की शानदार एवं जानदार कविता के लिए आभार उनकी कविताएं पढ़ता रहा हूँ बिहार के साथ पूरा देश उनपर गर्व कर सकता
है,अभी ’साक्ष्य’पत्रिका में उनकी बेहतरीन कविताएं पढ़ा हूँ , बधाई..अच्छी कविता के लिए.

सुशील कुमार July 21, 2009 at 2:29 PM  

अरविन्द श्रीवास्तव की कवितायें विमानवीकरण पर अपना सवाल रखती हुई सामाजिक सरोकार को बड़ी सूक्षमता और गहराई से पकड़ती है।दोनो कविता आदमीयत को आगे लाने के लिये संघर्ष कर रही है।बधाई इन अच्छी कविताओं के लिये।

Anonymous July 22, 2009 at 3:49 PM  

bahut achhi kavitayen, badhai aapko..

परमजीत बाली August 2, 2009 at 3:46 PM  

बहुत बढिया रचनाएं प्रेषित की हैं।धन्यवाद।

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