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  अशोक सिंह की एक ताज़ा कविता- पहाड़ पर बैठ एक पहाड़िया आदिवासी प्रेमी युगल की बात-चीत

Sunday, July 12, 2009

अशोक सिंह-

परिचय-
जन्म : 08 फरवरी, 1971,बिहार के जमुई जिले में, किंतु बचपन से दुमका (झारखण्ड) में निवास। शिक्षा :- बी०ए०, (हिंदी) ।रुचि: साहित्य,रंगमंच,रेखांकन और पत्रकारिता। हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में लिखने-पढ़ने में गहरी रुचि. कविताएँ-आलेख इत्यादि कई प्रमुख पत्रिकाओं प्रकाशित।जनजातीय विषयों पर अनेक शोध-आलेख प्रकाशित।निर्मला पुतुल की संताली कविता संग्रह "नगाड़े की तरह बजते शब्द" का हिंदी रुपांतरण जो ज्ञानपीठ प्रकाशन से छपा है।पेशा- "जनमत शोध संस्थान'' , दुमका का संचालन और स्वतंत्र पत्रकारिता।

संपर्क - जनमत शोध संस्थान,
मो।- केवटपाडा़, पोस्ट - पुराना दुमका /
जिला-दुमका /झारखंड-814 १०१
ईमेल- ashok.dumka@gmail.com
मोबाईल- 09431339804

कविता-

पहाड़ पर बैठ एक पहाड़िया आदिवासी प्रेमी युगल की बात-चीत



अब हम कहां मिलेंगे फूलमनी
किस जंगल किस पहाड़ पर
मिलेंगे हम दोनों



गाँव के पिछ्वारे जो जंगल था
वह धीरे-धीरे कट गया
देखो न, अब तो पहाड़ भी काटे जा रहे हैं
पिछले कुछ सालो में ही
देखते-देखते गायब हो गये कई पहाड़
और जो थोड़े-बहुत बचे-खुचे हैं ,
वे नंगे और बदरंग हो गये हैं



इक्के-दुक्के जो कहीं हैं भी दूर-दराज में तो,
सुना है वहाँ नक्सलियों का डेरा है
खतरे से खाली नहीं है
वहाँ जाकर हमदोनों का मिलना



पता नहीं कब कोई पुलिसवाला
नक्सली कहकर पकड़ ले जाय हमें
जिस तरह अभी हाल में ले गये
काठीकुंड के सालदाहा पहाड़ी से
रूपलाल और निरोजनी को



और यह जो बस्ती की सीमा के पार
छोटी-सी कुरुवा पहाड़ी भी थी अपनी
जिस पर कभी मिलते थे हमदोनों
अपने गाय-बकड़ियों को चराने के बहाने
वह अब सृष्टि -उद्यान* में बदल गया है
जहां न तो साल वृक्ष हैं
न पलाश और आम के झूले
न ही बाँसों की झुरमुट
वहां अब कटीले तारों के बाड़ लगे हैं
और गेट पर कड़ा पहरा है




वह पहाड़ी अब हमारी नहीं रही फूलमनी
वह अब बाबूओं के बच्चे-बहु -बेटियों के लिये
मनोरंजन -पार्क बन गया है
जहां हम जैसों को
अंदर जाने की मनाही है




देखा नहीं उस दिन,
जब उसके पिछवारे बैठ हम दोनों

बतिया रहे थे अपना सुख-दु:ख,
किस तरह गार्ड ने
चोरी के नाम पर
फटकार कर भगाया था हमें!




अब ऐसे में
जब कहीं कोई सूरक्षित जगह
नहीं बची हमारे मिलने की,
तुम्ही बताओ फूलमनी
हम कहां मिलें तुमसे
किस जंगल किस पहाड़ पर मिलें हम दोनों ?


* * * * *

सृष्टि-पहाड़* - दुमका के कुरुवा पहाड़ का वह स्थल जहाँ सरकार ने

अपने कब्जे में उसका सौंदर्यीकरण किया है ।



13 comments:

HARI SHARMA July 12, 2009 at 10:37 PM  

देखे़ तो ये प्रगति और सौन्दर्यीकरन से पहाडी जीवन पर पड रहे प्रभाव की कहानी है अब यू तो इसका स्वागत ही होना चाहिये लेकिन कविता प्रेमी युगल के निहित स्वार्थ ( अकेले मिलने का सुख ) की चिन्ता मे़ लिखी गई है तो हम तो यही कामना कर्ते है़ कि ये प्रेमी युगल जल्दी शादी करके असीमित मिलन सुख पाये. कविता मे़ इस समस्या का निर्वाह बखूबी हुआ है.

अविनाश वाचस्पति July 12, 2009 at 10:48 PM  

शब्‍दों में मिले
सपनों में मिलें
कविता में मिलें
कहानी में मिलें
आंखों में बसें
दिल में घर करें
फिर और किसी की तलाश नहीं होगी।

अविनाश वाचस्पति July 12, 2009 at 10:49 PM  

शब्‍दों में मिले
सपनों में मिलें
कविता में मिलें
कहानी में मिलें
आंखों में बसें
दिल में घर करें
फिर और किसी की तलाश नहीं होगी।

संगीता पुरी July 12, 2009 at 10:57 PM  

बहुत सुंदर रचना .. इसमें प्रेमी प्रमिका के माध्‍यम से बिल्‍कुल सहज ढंग से शहरी सौंदर्यीकरण के नाम पर प्राकृतिक सुदरता को नष्‍ट किए जाने को और इससे ग्रामीणों के लिए समस्‍याएं खडी होने को अभिव्‍यक्ति दी गयी है।

राज भाटिय़ा July 13, 2009 at 1:12 AM  

वाह आप ने इए प्रेम को प्रेमिका के जरिये आज की समस्या पर बहुत सुंदर कविता लिखी. यह चिंता सच मै बहुत बडी विपत्ति लाने वाली है, अगर अभ भी न चेते तो.
धन्यवाद

Udan Tashtari July 13, 2009 at 6:18 AM  

संकेत में प्रकृति संरक्षण की जागरुकता जगाती रचना..बहुत सधी हुई. पसंद आई. आपका आभार प्रस्तुत करने का.

सुभाष नीरव July 13, 2009 at 11:40 AM  

एक अच्छी कविता पढ़ने को मिली अशोक सिंह की।

vandana July 13, 2009 at 1:00 PM  

prkriti ke dohan ko chitrit karti rachna jahan premi yugal ke prem aur dard ko bakhubi chitrit kiya gaya hai.

PRAN SHARMA July 13, 2009 at 4:07 PM  

ACHCHHEE KAVITA HAMESHA MUN KO
BHAATEE HAI.ASHOK SINGH KEE KAVITA
PADHKAR BAHUT ACHCHHAA LAGA HAI.

Dinanath July 13, 2009 at 5:18 PM  

कविता के बहाने अशोक सिंह जी ने जो कह डाला वह चिंता केयोग्य ह। बहु्त अच्छा\

सुशील कुमार July 13, 2009 at 5:23 PM  

अशोक सिंह की लगभग सभी कवितायें जनजातीय पृष्ठभूमि में लिखी होती है। उनकी इस कविता में सरकार और शासन के द्वारा आदिवासी भावनाओं पर जो कुठाराघात हो रहा है,उसका वास्तविक चित्रण हुआ है।

Arun Kumar Jha July 14, 2009 at 9:47 PM  

प्रिय अशोक जी
सुशिल जी के आग्रह पर शब्द लोक को देखा. देखकर ख़ुशी हुई कि आप भी इनके साथ हैं. आप जिस विषय पर लगातार लिख रहे हैं, वह उम्दा तो होगा ही. आशा करता हूँ ये ब्लॉग अपने व्यापक उदेश्य की पूर्ति में अवश्य ही सफल होगा
मेरी हार्दिक सुभ कामनाएं
अरुण कुमार झा

mahinder pal July 15, 2009 at 9:50 PM  

badhiya kavita ! behad marmsparshi !kuchh uljhanon ke saath saath kuchh savaal bhi saamne rakhti hai . uljhanein premi yugal ke bhitar maujood tanaavon ko to rekhankit karti hein lekin ek rachnakaar ki jeevan drishti jise nirantar maujooda duniya ke badalne ke saath saath parishkrit hote jaane ki jaroorat hoti hai.is nazar se kuchh savaal bhi khade karti hei .maslan kya naya jo bhi kuchh aa rahaa hai saaraa bekar hai ya jo bhi purana hai vo abhi bhi samridhh va sanrakshit rakhaa ja sakta hai . is bare mein mai behad uljhan mein hun .umeed hai aisi galiyon se aap bhi guzar rahe honge ya guzre honge .

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