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  पंजाब के वरिष्ठ कवि डा. सुतिंदर सिंह नूर की कुछ कवितायें: अनुवाद सुभाष नीरव

Wednesday, July 8, 2009

भाषान्तर स्तंभ में प्रस्तुत है पंजाब के एक बड़े कवि डा. सुतिंदर सिंह नूर की कुछ कवितायें। इनका अनुवाद किया है हिन्दी के प्रखर लेखक-कवि-अनुवादक सुभाष नीरव जी ने।
डा. सुतिंदर सिंह नूर पंजाबी के वरिष्ठ कवि, गहन चिंतक और प्रखर आलोचक हैं। डा। नूर की पंजाबी में पाँच कविता पुस्तकें (‘विरख निपत्तरे’, ‘कविता दी जलावतनी’, ‘सरदल दे आर-पार’, ‘मौलसिरीऔरनाल-नाल तुरदियाँ’), एक कविता-संग्रह हिंदी में (साथ-साथ चलते हुए) तथा आलोचना की लगभग ढाई दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। अनेक पुस्तकों का संपादन किया है। यू.के., अमेरिका, थाईलैंड, पाकिस्तान में आयोजित अन्तरराष्ट्रीय गोष्ठियों और सेमिनारों में शिरकत की है। डा. नूर भारतीय साहित्य अकादमी, पंजाबी साहित्य अकादमी, दिल्ली, भाषा विभाग, पंजाब के साथ-साथ सफ़दर हाशमी तथा अनेक भारतीय तथा अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजे जा चुके हैं। दिल्ली विश्ववि़द्यालय से सेवा-निवृत्त है और फिलहाल पंजाबी अकादमी, दिल्ली की पत्रिकासमदर्शीके सम्पादक हैं।


कवितायें -
एक -


मैं ही मुक्त न हुआ -1



तुमने तो मुझे
कई बार मुक्त किया
मैं ही मुक्त न हुआ।



मैं बहुत बार चला जाता
मखमली घास पर
अदृश्य कदमों के निशान खोजता
बातें करता
ताज़ा फूल और पत्तियों के संग
खिलते हुए फूलों की
प्रथम आयु की महक का इंतज़ार करता
किसी अदृश्य टहनी के
कोयल कूकती और कहती-
मैं गीत के साथ-साथ
प्रतीक्षा करती हूँ तेरी बहुत आगे।


मैं पहुँचता
बूँदा-बांदी के पार
दूर नदियों के पास
देखता लहरों को
उमड़ते-फैलते।



मैं खेलता
इन्द्रधनुष की
ऊँचाइयों के अंग-संग
और अन्त में
लौट आता वापस
तेरी सरगमों को
देखता-परखता।


तूने तो मुझे मुक्त किया
कई बार
मैं ही मुक्त न हुआ।


दो-

मैं ही मुक्त न हुआ - २


मैं प्रेम में बहुत गलतियाँ करता हूँ
और तुम
मुझे समझाने लगती हो बार-बार।


मैं गीतों की भांति
आसमान में उड़ती हुईं
अबाबीलों को पकड़ने लग जाता हूँ
तुम कहती हो-
ऐसा मत करो
ये आज़ाद ही अच्छी लगती है।


मैं झुण्ड में जागते जुगनूओं को
हाथ में पकड़ने लगता हूँ
तुम कहती हो-
ऐसा न करो
ये सब मर जाएंगे।




मैं बारिश के बाद
रेत पर चली जाती
लाल बीर-बहुटियों के
कदमों की बनती जंजीर को
सुलझाने लगता हूँ
मेरे साथ चलते हुए
तुम कहती हो-
ऐसे मत करो
कई बार ये रास्ते उलझ भी जाते हैं।



मैं हरी-भरी वादियों में से गुजरते हुए
फूलों जैसी तितलियों को पकड़कर
तेरे कंधों पर रखने लगता हूँ
तुम कहती हो-
ऐसे मत करो
कई बार तितलियों का भार भी
बहुत होता है।



मैं प्रेम में
बहुत गलतियाँ करता हूँ
और तुम मुझे
समझाने लगती हो बार-बार।


तीन -

मैं जब


मैं जब
तेरे अंगों में उतर गया
मुझे घोंसलों में
चहचहाते पक्षी
और
आँखें खोलतीं नर्म कोमल पत्तियाँ
बहुत प्यारी लगने लगीं।


0

जब मैं
तेरे दो झीलों वाले शहर में आया
तूफान मेरी आँखों में जागे
और हंस
उन झीलों में डूब गए।


0

जो सूर्य
तुम से बिछुड़ते हुए
तेरे शहर में
डूब गया था
वही सूर्य मैं
इस शहर में ढूँढ़ रहा हूँ।



चार -

एक पक्षी

तेरे आने के बाद
एक पक्षी
मेरे अन्दर घोंसला बनाता है
गहराइयों में खो जाता है।


तेरे जाने के बाद
एक पक्षी
खुले आकाश में उड़ता है
उकाब की भांति
अंतरिक्षों को चीरता है
और खो जाता है।

**

***कवि-संपर्क :
डी-132, मान सरोवर गार्डन
नई दिल्ली-110015
फोन : 092120-68229, 098113-05661

वक्तव्य - “जहाँ तक अनुवाद कार्य की बात है, मैं अनुवाद को भी सृजनात्मक लेखन के अन्तर्गत ही लेता हूँ। एक अच्छी रचना का अच्छा अनुवाद अपनी मौलिक रचना जैसा ही आस्वाद देता है और सुकून भी। अनुवाद से जुड़ कर मैं शब्द के और निकट हुआ हूँ और उस की
शक्ति को पहचान पाया हूँ। मेरा मानना है कि 'शब्द क्या है ?' 'उस की शक्ति क्या है, इसे हर रचनाकार को समझना चाहिए तभी वह अपनी रचनाओं में वह प्रभाव ला पाने में कामयाब हो पाएगा जिससे रचना श्रेष्ठ बनती है। बहुत से लेखक- कवि अनुवाद कार्य को दोयम दर्जे का कार्य मानते हैं, पर मैं ऐसा नहीं मानता। बल्कि यह अनुवाद कर्म मेरी सृजनात्मकता को और अधिक प्रभावकारी और गहरा बनाता है।" - हिन्दी अनुवादक- सुभाष नीरव
संपर्क- 372, टाइप-4, लक्ष्मी बाई नगर, नई दिल्ली-110023(E.mail- subhneerav@gmail.com), आवासीय फोन : 011-24104912, India

23 comments:

अविनाश वाचस्पति July 8, 2009 at 9:38 PM  

शब्‍दों के सभी लोकों की
बोलियों की भाषाओं की
कविताओं से रूबरू होने
के लिए एक सुंदर स्‍थल
और बेहतरीन साहित्‍यप्रेमी।

प्रदीप कांत July 8, 2009 at 11:21 PM  

ACHCHI KAVITAEN

Dr. Sudha Om Dhingra July 8, 2009 at 11:32 PM  

जितनी सुंदर कविताएँ-उतना सुंदर अनुवाद!
लेखक, अनुवादक दोनों साधु वाद के पात्र.
बहुत -बहुत बधाई!

Pran Sharma July 8, 2009 at 11:37 PM  

Dr.Sutindar Singh "Noor" ka punjabi
sahitya mein vishesh sthaan hai.
Unkee kavitaayen padh kar badaa
sukhad lagaa.kavitaaon kaa bhaav
paksh hee nahin ,kalaa paksh bhee
badaa majboot hai.Sundar anuvaad
ke liye Shri Subhash Neerav badhaaee ke patr hain.

HARI SHARMA July 9, 2009 at 12:14 AM  

अनुवाद साहित्य को दुनिया की सैर कराता है. इस्मे़ दोबो का फ़ायदा है लेखक का भी पाठक का भी.
अच्छे गीत, बढिया अनुवाद और शानदार प्रस्तुति

शशि पाधा July 9, 2009 at 2:03 AM  

बहुत ही सुन्दर रचनाओं का उतना ही मधुर अनुवाद। अन्तर्मन को छू गईं सारी रचनाएं ।
बहुत बहुत धन्यवाद

शशि पाधा

Ashok July 9, 2009 at 8:49 AM  

बेहतरीन कविता, अन्यतम अनुवाद और शानदार प्रस्तुति। बधाई।- अशोक सिंह ,दुमका।

Anshu Bharti July 9, 2009 at 8:51 AM  

आदरणीय सुभाष जी के अनुवाद कला की मैं कायल हूँ। आपका प्रस्तुतुकरण भी उम्दा लगा।

सुभाष नीरव July 9, 2009 at 12:06 PM  

भाई सुशील जी, आपने डा0 नूर की कविताओं का मेरे द्वारा किया गया अनुवाद "सबद-लोक' में प्रकाशित किया, सच बहुत अच्छा लगा। इन कविताओं पर आईं टिप्पणियां भी मन को सुकून देती हैं। आपके इस वेब साइट की पृष्टभूमि ब्लैक है जिस पर या तो सफेद रंग में या फिर गाढ़े पीले या लाल रंग में ही अक्षर उभर कर आते हैं। डा0 नूर के बारे में और मेरे यानी अनुवादक के बारे में दी गई टिप्पणियों के लिए जो कलर दिया गया है, वह अक्षरों को पढ़ने में काफी दिक्कत पैदा करता है। मुझे तो वैसे ही कम दिखाई देता है। मेरे जैसे बहुत से पाठक होंगे जो इस कलर में दिए गए अक्षरों को सहजता से न पढ़ पाते होंगे। मेरी बिटिया ने जब अपना ब्लॉग "नए स्वर, नए कदम" का टेम्पलेट काली पृष्टभूमि का चुना तो उसने इस बात का भरपूर खयाल रखा कि पोस्ट में जाने वाला मैटर ऐसे कलर में न हो जो उभर कर ना आ सके और और पाठकों को पढ़ने में किसी प्रकार की परेशानी हो। आशा है, कलर का चयन करते समय भविष्य में आप ध्यान रखेंगे। हाँ, पोस्ट का ऊपरी दायां हिस्सा खाली रहता है, ऐसा क्यों ? कोई तकनीकी दिक्कत होगी शायद। मेरी शुभकामनाएं !

सुशील कुमार July 9, 2009 at 2:34 PM  

आदरणीय सुभाष नीरव जी,
मैं धीमी गति की नेट-सुविधा पर काम करता हूँ क्योंकि यहाँ यही उपलब्ध हो पाता है। फिर भी आपके द्वारा इंगित किये गये पोस्टिंग संबंधी कतिपय त्रुटियों का यथासंभव परिहार कर दिया गया है। सादर सूचनार्थ।

सुभाष नीरव July 9, 2009 at 3:32 PM  

सुशील भाई, बहुत बहुत शुक्रिया। अब अक्षर पढ़ने योग्य हो गए हैं।

सुभाष नीरव July 9, 2009 at 3:32 PM  
This comment has been removed by the author.
Anonymous July 9, 2009 at 9:50 PM  

bahut achchi kavitayeN haiN.
susham
"sb12@columbia.edu" sb12@columbia.edu

अरविन्द श्रीवास्तव July 10, 2009 at 5:45 PM  

गजब निखार आ रहा है सबद-लोक में, आपके संपादन में यह सफल और सार्थक पत्रिका पठकों को अनवरत मिलता रहे...मेरी हार्दिक शुभकामनाएं...

Dinanath July 10, 2009 at 9:23 PM  

बहुत अच्छी प्रेम कविता लिखी है सुतिन्दर जी ने,और उतना ही बढिया अनुवाद है सुभाष जी का। ...आपका ब्लाग बहुत खूबसूरत लग रहा हैं। मेरी बलैया लें।

रूपसिंह चन्देल July 11, 2009 at 5:22 AM  

प्रिय सुभाष,

तुम्हारे द्वारा अनूदित डॉ. नूर की कविताएं पहले भी पढ़ने के अवसर मिले हैं.ये कविताएं बहुत अच्छी हैं. पंजाबी से हिन्दी अनुवाद के मामले में तुम्हारी कोई तुलना नहीं. बधाई.

चन्देल

सुशील कुमार July 11, 2009 at 8:30 AM  

आदरणीय रूप सिंह चन्देल जी का मैं ‘सबद-लोक’साईट पर हार्दिक अभिनंदन करता हूँ।

सुशील कुमार July 11, 2009 at 10:17 AM  

पंजाब के वरीय कवि डा. सुतिंदर सिंह की इन कविताओं में एक पुरुष-मन में प्रेम की जो लहरें उठ रही हैं वे पाठक के मन में हिलोरें लेती हुई मानावीय करुणा का भी लक्ष्य करती हैं जिसमें बहकर वह कुछ समय के लिये खो-सा जाता है। यह न मात्र एक उच्च कोटि की कविता का संकेत है, बल्कि कविता में यह गहराई सुभाष नीरव जी की अनुवाद-विधा की सफलता का पुष्ट प्रमाण देती हैं।

kumar July 12, 2009 at 7:38 PM  

shabad lok men main laya gaya aur mari kavitayen pasand kee gayi , bahoot khushi hui.
arvind thakur,supaul.

परमजीत बाली August 7, 2009 at 1:05 AM  

बहुत सुन्दर रचनाएं प्रेषित की हैं आभार।

Virender Mehta September 10, 2016 at 10:20 PM  

बहुत उम्दा आदरणीय सुभाष नीरव जी। मन को छु गयी। सुंदर अनुवाद। सादर।

Vibha Rashmi September 11, 2016 at 6:59 AM  

सुरिंदर जी की उम्दा अभिव्यक्ति का आस्वादन किया । कविताएँ बहुत पसंद आयीं । बधाई कवि उनको । कविताओं का नीरव भाई ने बहुत सुन्दर अनुवाद किया है । दोनों को बहुत बधाई ।

Vibha Rashmi September 11, 2016 at 7:00 AM  

सुरिंदर जी की उम्दा अभिव्यक्ति का आस्वादन किया । कविताएँ बहुत पसंद आयीं । बधाई कवि उनको । कविताओं का नीरव भाई ने बहुत सुन्दर अनुवाद किया है । दोनों को बहुत बधाई ।

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