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  किस्सा जनतंत्र / सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’

Tuesday, July 7, 2009

सुदामा पांडे 'धूमिल' साठोत्तरी कवियों में सर्वाधिक प्रमुख हैं जो भाषा के जंगल में कविता के वर्जित प्रदेशों की खोज करते हुए अपने प्राणांत तक मानवीय सरोकार के कवि बने रहे। ब्रेन-ट्युमर की हौलनाक नारकीय यातनाओं से गुजरते हुए 10 फरवरी,1975 को नौ बजकर पचास मिनट पर लखनऊ मेडिकल कालेज के बेड बन.-2 पर धूमिल ने अपने मजबूत ढांचे को मात्र 40 की वय के भीतर ही हमेशा के लिये छोड़ दिया। उनकी असामयिक मौत से हिन्दी कविता पर मानो वज्रपात हो गया क्योंकि उनकी जोड़ का फ़िर दूसरा कवि अब तक हिंदी ने नहीं जना। उनकी काव्य-शैली की छाप एक पूरे समय की कविता पर है। अपनी अलग शैली बनानेवाले ऐसे कवि इतिहास में बहुत थोडे़ ही होते हैं जिन्हें एक पूरी पीढी़ अपनी अभिव्यक्ति के लिए अनिवार्य समझती हो। शुद्ध कविता के विरोध में अपना एक खास मुहावरा विकसित कर उन्होंने हिंदी-कविता को अपने शब्द दिये। काव्यभाषा की प्रचलित अवधारणा को तोड़कर नये प्रतिमान स्थापित करने के लिए जिस अपरिमित साहस और नये काव्यविवेक की जरुरत होती है, उसका निश्चित प्रमाण धूमिल की कविताएं देती हैं ।

काव्यात्मक उर्जा और नैतिक साहस में अद्वितीय पहचान बनानेवाले धूमिल के जीवनकाल में मात्र एक ही काव्यसंग्रह ही प्रकाशित हो पाया- संसद से सड़क तक, जिसका आतंक आज तक कविता-साहित्य पर अनुभव किया जा सकता है। उनकी दो मरणोत्तर कृतियां भी हैं- 'कल सुनना मुझे' और 'सुदामा पांडे़ का प्रजातंत्र'।
धूमिल भावनाओं के स्थान पर गहरे विचार के कवि हैं। यथार्थ की गहराई से टटोल के कारण उनकी कविताएं अर्थ-गुम्फित और कहीं-कहीं वक्र भी हो गयी हैं जिस पर पाठकों को गहन पैठ बनाने के लिये समय-सापेक्ष उनके मन में व्यवस्था के प्रति हिंलोरें लेती अराजकता, उनके जीवन के संघर्ष की जटिलता और उनकी रचना-प्रक्रिया को बारीकी से समझना पडे़गा और उनकी रचना को कई बार, और मन देकर पढना होगा । उनके मित्र और लब्ध-प्रतिष्ठ समालोचक श्री काशी नाथ सिंह ने लिखा है --"रचना में चली आ रही वायवी, काल्पनिक और व्यक्तिगत भावभूमि को छोड़कर उसने कविता को समसामयिक यथार्थ से जोडा़ ।
उसने कविता को बिंबों की घटाओं से निकाला ।
उसने कविता को अमुर्तन के अंधेरे से उबारा ।

वह कहता था- "भाषा अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रही है । कुछ हैं जो भाषा को खा रहे हैं ।" उसने भाषा को उसकी जिम्मेदारी की जगह तैनात किया । उसने कविता को एक खास तरह की मुंहफट और खुर्राट ज़बान दी ।
उसने कहा कि " पहले लोग कहते थे, कविता करेंगे । आज हम कहते हैं,
कविता हो या न हो, हम आदमी करेंगे ।" अगर धूमिल की उपर्युक्त स्वभावगत आग्रहों को दृष्टिपथ में रखते हुए हम उनकी कविता-लोक से गुजरेंगे तो यथार्थवादी साहित्य का सच्चा और खरा दर्शन कर पायेंगे, तो
आइए, इस परिप्रेक्ष्य में उनकी एक बेहद चुनिंदा कविता ‘किस्सा जनतन्त्र’ को देखें--

करछुल
बटलोही से बतियाती है और चिमटा
तवे से मचलता है
चूल्हा कुछ नहीं बोलता
चुपचाप जलता है और जलता रहता है

औरत -
गवें गवें उठती हैं- गगरी में
हाथ डालती है
फिर एक पोटली खोलती है।
उसे कठवत में झाड़ती है
लेकिन कठवत का पेट भरता ही नहीं
पतरमुही ( पैथन तक नहीं छोड़ती)
सरर-फरर बोलती है और बोलती रहती है


बच्चे आँगन में-
आँगड़-बाँगड़ खेलते हैं
घोड़ा-हाथी खेलते हैं
चोर-साव खेलते हैं
राजा-रानी खेलते हैं और खेलते रहते हैं
चौके में खोई हुई औरत के हाथ
कुछ भी नहीं देखते
वे केवल रोटी बेलते हैं और बेलते रहते हैं

एक छोटा- सा जोड़- भाग
गश खाती हुई आग के साथ-साथ
चलता है और चलता रहता है

बड़कू को एक
छोटकू को आधा
परबत्ती बालकिशुन आधे में आधा
कुल रोटी छै
और तभी मुँहदुब्बर
दरबे में आता है- खाना तैयार है?
उसके आगे थाली आती है
कुल रोटी तीन
खाने से पहले मुँहदुब्बर
पेट भर
पानी पीता है और लजाता है
कुल रोटी तीन
पहले उसे थाली खाती है
फिर वह रोटी खाता है

और अब-
पौने दस बजे हैं-
कमरे की हर चीज़
एक रटी हुई रोजमर्रा धुन
दुहराने लगती है
वक्त घड़ी से निकलकर
अँगुली पर आ जाता है और जूता
पैरों में, एक दन्तटूटी कंघी
बालों में गाने लगती हैं

दो आँखें दरवाजा खोलती हैं
दो बच्चा टाटा कहते हैं
एक फटेहाल कलफ कालर-
टाँगों पर अँकड़ भरता है
और खटर पटर एक ढढ्ढा साईकिल
लगभग भागते हुए चेहरे के साथ
दफ़्तर जाने लगती है
सहसा चौरस्ते पर जली लाल बत्ती जब
एक दर्द हौले से हिरदै को हूल गया
‘ऐसी क्या हड़बड़ी कि जल्दी में पत्नी को
चूमना-
देखो, फिर भूल गया।’
(धूमिल कृत कविता संग्रह 'कल सुनना मुझे'से साभार)

11 comments:

रवि कुमार, रावतभाटा July 7, 2009 at 11:19 PM  

शुक्रिया...
धूमिल की इस कविता से गुजरने का अवसर प्रदान करने के लिए....

sudhir July 7, 2009 at 11:20 PM  

‘किस्सा जनतन्त्र’ बरसों पहले पढ़ी रचना आज आपके सौजन्य से फिर से पढ़ने को मिली. इसी बहाने से आपके ब्लॉग पर भी आना हो गया. अच्छा लगा.
-सुधीर सक्सेना 'सुधि' जयपुर

समय July 7, 2009 at 11:29 PM  

बेहतर, कविता और आपके सरोकार।

धूमिल जी की एक कविता की व्याख्या के बहाने एक संवाद हुआ था।
शायद आपको दिलचस्पी हो।
देखें:
http://main-samay-hoon.blogspot.com/2009/06/blog-post_08.html

HARI SHARMA July 7, 2009 at 11:54 PM  

kavita kosh se sabhaar


हिन्दी साहित्य की साठोत्तरी कविता के शलाका पुरुष स्व. सुदामा पाण्डेय धूमिल अपने बागी तेवर व समग्र उष्मा के सहारे संबोधन की मुद्रा में ललकारते दिखते हैं। तत्कालीन परिवेश में अनेक काव्यान्दोलनों का दौर सक्रिय था, परंतु वे किसी के सुर में सुर मिलाने के कायल न थे। उन्होंने तमाम ठगे हुए लोगों को जुबान दी। कालांतर में यही बुलन्द व खनकदार आवाज का कवि जन-जन की जुबान पर छा गया।

9 नवंबर 1936 को बनारस के खेवली गांव में जन्मे सुदामा पाण्डेय की प्रारंभिक शिक्षा गांव की प्राथमिक पाठशाला में हुई। हरहुआ के कूर्मि क्षत्रिय इण्टर कालेज से सन् 1953 ई. में हाईस्कूल की परीक्षा पास की। आगे की पढाई के लिए बनारस गये तो, मगर अर्थाभाव के चलते उसे जारी न रख सके। फिर क्या, आजीविका की तलाश में वे काशी से कलकत्ता तक भटकते रहे। नौकरी भी मिली तो लाभ कम, मानसिक यंत्रणा उन पर ज्यादा भारी पडी। वर्षो का सिरदर्द अंतत: ब्रेनट्यूमर बनकर मात्र उनतालिस वर्ष की अल्पायु में ही, उनकी मृत्यु का कारण बना।

सबसे पहली रचना धूमिल ने कक्षा 7 में पढते हुई की। इनकी प्रारंभिक रचनाएं गीत के रूप में मिलती हैं- बांसुरी जल गयी इनके फुटकर व शुरुआती गीतों का संग्रह है, जो आज उपलब्ध नहीं है। उनकी दो कहानियां फिर भी वह जिंदा है और कुसुम दीदी, उनकी मृत्युपरांत 1984 में प्रकाशित हुई। वैसे उनकी अक्षय कीर्ति की आधार बना संसद से सडक तक नामक कविता संग्रह, जो सन् 1971 में प्रकाश में आया।

राज भाटिय़ा July 8, 2009 at 12:06 AM  

सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’ जी की कविता पढाने के लिये धन्यवाद, बहुत सुंदर लगी यह कविता.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi July 8, 2009 at 1:21 AM  

इस कविता ने जनतंत्र को आइना दिखा दिया है।

Arvind Mishra July 8, 2009 at 5:14 AM  

धूमिल की कवितायेँ एक टीस छोड़ जाती हैं ! शुक्रिया !

Udan Tashtari July 8, 2009 at 5:49 AM  

आभार धूमिल की इस प्रस्तुति के लिए.

अनुपम अग्रवाल July 8, 2009 at 10:56 AM  

हिन्दी साहित्य के हस्ताक्षर की कलम से आम आदमी की ज़िन्दगी और सोच पास से दिखाने का शुक्रिया .

अच्छी पोस्ट के लिये बधाई

Raghav July 8, 2009 at 1:24 PM  

Dhumil ki achhchhi kavita published karne ke liye Thanks
Raghav Jaipur

दिगम्बर नासवा July 8, 2009 at 4:20 PM  

धूमिल ji की इस कविता mein bejod shilp aur bhaavon ka mishran hai.....lajawaab likhaa hai unhone.....aapka bhi shukriya sab tak is rachnaa ko laane ke liye..

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