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  खुश है जमाना आज .... (हरिभूमि में प्रकाशित व्‍यंग्‍य)

Thursday, April 1, 2010

मूर्ख दिवस कहीं जाता नहीं है वो तो यहीं बसा रहता है सबके दिमाग में। बस सिर्फ होता यह है कि एक अप्रैल को वह उकसाए जाने पर अपनी पूर्णता में सिर उठाता है और अपने वजूद का ऐलान कर देता है और देखिए सब उसके प्रभाव में बह जाते हैं या मोहग्रसित हो जाते हैं।

अब सुबद्धि सुप्‍त ही पड़ी रहे तो उसकी ओर किसी का ध्‍यान नहीं जाता है। पर मूर्खता सिर उठाती है तो सबको अपनी तरफ ताकता पाती है और अपनी तरफ ताकने या घूरने के अहसास से दिमाग खुदबखुद असमंजस की स्थिति में आकर ताबड़तोड़ मूर्खताएं कर बैठता है और जिनमें ये मूर्खताएं सिर उठाने लगती हैं वे पहले बरस भर से दिमाग में कुलबुला रही होती हैं।

वैसे मूर्खता को जितना दबाया जाता है वो उससे भी अधिक तेजी से कुलांचे मारती है। एक रबर की ठोस गेंद की माफिक, अब आप दिमाग को रबर की ठोस गेंद भी मान सकते हैं, जिसे जितने वेग से दबाया जाता है वो उससे भी अधिक वेग से आपके दवाब से मुक्ति के लिए छटपटाती है और मौका पाते ही चौगुनी ताकत से ऊपर की ओर उछलती है। नतीजा, जिनको नहीं दिखलाई दे रही थी, उनको भी दिखलाई दे जाती है और यही मूर्खता का बाजारीकरण है जगह-जगह पर आप सेल में सामान बिकता देखकर इस अहसास में जकड़ते जाते हैं। मानो, आपको फ्री में मिल रहा है सामान और खूब सारा बेजरूरतीय सामान खरीद कर अपना घर भर लेते हैं। सर्दियों में गर्मियों के कपड़ों के ढेर और गर्मियों में सर्दियों के। सेल सदा बेमौसम ही लगाई जाती है क्‍योंकि सेल समान कुछ भी नहीं है। यह बाजार का चालाकीकरण है।

इसी का और अधिक चालाकीकरण करते हुए आजकल दुकानों में एक के साथ चार या दो के साथ दस जींस, शर्ट इत्‍यादि फ्री में दी जाती हैं विद 80 प्रतिशत छूट के साथ, जबकि यह सरेआम लूट ही होती है। पता नहीं हम सब यह क्‍यों मान लेते हैं कि कोई भी विक्रेता, निर्माता या दुकानदार फ्री में हमें बेचेगा। इसे बाजारू कलात्‍मकता कहा जा सकता है। जिसमें हम अपने को महाबुद्धिमान समझ कर अपनी मूर्खता का सार्वजनिक प्रदर्शन कर रहे होते हैं अपनी जेब से नोट लुटा लुटाकर।

इसी प्रकार आजकल मोबाइल फोन के आने से मूर्खता की संभावनाओं में घनघोर इजाफा हुआ है और मोबाइल की तरह मूर्खों की भरमार हो गई है। रोजाना नई स्‍कीमें लांच की जा रही हैं जो कि नि:संदेह मूर्ख बनाने की फैक्‍टरियां हैं – तीस रुपये खर्च करके दो हजार एसएमएस एक महीने में फ्री। यह मूर्खता एक रुपये रोजाना की दर से बेची जा रही है। इसी प्रकार कई मूर्खताएं दस रुपये रोजाना अथवा 200 रुपये महीने में भी धड़ल्‍ले से बिक रही हैं जिनमें आपको एक खास अपने नेटवर्क पर अनलिमिटेड टॉक टाइम दिया जाता है और आप अपने जीवन के कीमती पलों को फिजूल की बातें कर करके गर्क कर लेते हैं और अपनी बुद्धिमानीय कला पर मोहित होते हैं। अब भला एक या दस रुपये रोज खर्च करके सुविधाएं फ्री मिलना – क्‍या वास्‍तव में रुपये लेकर मूर्ख नहीं बनाया जा रहा है तो यह व्‍यापार खूब फल रहा है और फूल रहा है और फूल बन रहे हैं हम सब।

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  पप्‍पू की होशियारी देख लो

Saturday, March 13, 2010


पप्‍पू चला रहा था बाइक
बैठे उपर तीन होकर टाइट
पुलिस ने रोक लिया
तीन बैठना जुर्म है

पप्‍पू बोला हमें भी शर्म है
ईमानदारी सिर्फ तुम्‍हारा न धर्म है
इसलिए जुर्म को
मतलब तीसरे को
घर छोड़ने जा रहे हैं


हमें भी कानून तोड़ना नहीं सुहाता है
अपुन तीसरे को घर छोड़ने जाता है।

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  पप्‍पू की पत्‍नी को तलाशो ?

Saturday, March 6, 2010

पप्‍पू की पत्‍नी
बस में नहीं रही
वो उसे कहां ढूंढे

मैंने बतला दिया
तुरंत से जल्‍दी
कार में तलाशो

वो सचमुच में
बस में नहीं थी
कार में भी नहीं थ|

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